*अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस**केन्द्रीय बजट मजदूरों, किसानों और बेरोजगार युवाओं की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरता**सुरेश कुमार कनौजिया देवीपाटन मंडल गोंडा उत्तर प्रदेश*




सुरेश कुमार कनौजिया देवीपाटन मंडल गोंडा उत्तर प्रदेश

एआईटीयूसी अन्य केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के साथ मिलकर 5 फरवरी, 2025 को बजट के खिलाफ देशव्यापी विरोध प्रदर्शन करेगी।

वित्त मंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण द्वारा आज प्रस्तुत बजट 2025-2026 पर प्रारंभिक प्रतिक्रिया में ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस एटक की राष्ट्रीय महासचिव अमरजीत कौर ने प्रेस को जारी बयान में कहा कि बजट 2025-2026 मजदूरों, किसानों और बेरोजगारों की उम्मीदों पर पानी फेरता है।

आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि से आम आदमी को राहत मिलने की कोई उम्मीद नहीं है।

2025-2026 का बजट दर्शाता है कि मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से लागू नीतियों का सिलसिला जारी है, जिसके परिणामस्वरूप असमानताएं बढ़ी हैं। यह बजट भी हमें उसी दिशा में ले जाएगा।

बजट पेश करते समय वित्त मंत्री ने बड़े-बड़े बयान दिए, जिनका शोषित वर्गों से कोई लेना-देना नहीं था। इस सरकार का रिकॉर्ड यह रहा है कि वह योजनाओं की घोषणा तो करती है, लेकिन देश को कभी नहीं बताती कि उनके क्रियान्वयन का क्या हुआ।

यह बजट अनौपचारिक अर्थव्यवस्था के श्रमिकों, बेरोजगार युवाओं, गरीबों और सीमांत किसानों के लिए एक और झटका है, जिनकी उपेक्षा की गई है।

बजट शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, गरीब, हाशिए पर पड़े और निम्न आय वर्ग की जरूरतों के साथ न्याय नहीं करता है, जिन्हें सहायता के लिए तत्काल अधिक आवंटन की आवश्यकता है। ये घोषणाएं केवल वोट हासिल करने के लिए थोड़े समय के लिए होती हैं।

मध्यम वर्ग के लिए कर छूट बढ़ा दी गई है, लेकिन आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृ‌द्धि से लोगों को पहले ही कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है और यह बजट मुद्रास्फीति के मु‌द्दे को हल करने में विफल रहा है। मुद्रास्फीति के कारण मजदूरी में गिरावट आई है। आर्थिक सर्वेक्षण से पता चला है कि स्वरोजगार और वेतनभोगी श्रमिकों के मासिक वेतन में 2017-2018 की तुलना में 2023-2024 में कमी आई है। स्वरोजगार वाले पुरुषों के मामले में, इस अवधि के दौरान मजदूरी 9.1% कम है, तथा महिलाओं के लिए 32% कम है। इसी तरह वेतनभोगी वर्ग में पुरुषों के लिए 6.4% और महिलाओं के लिए 0.5% की कमी आई है। इसी अवधि के दौरान

कॉर्पोरेट्स की संपत्ति में 22.3 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसका एक प्रमुख कारण वहां काम करने वाले लोगों के वेतन में कटौती करना है। इसी सर्वेक्षण के अनुसार, रोजगार में केवल 1.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई। शिक्षा सार्वजनिक क्षेत्र के उ‌द्यमों और सार्वजनिक सेवाओं के निजीकरण और बिक्री का इसका एजेंडा प्रतिशोध के साथ जारी है। बीमा क्षेत्र में 100% विदेशी निवेश की घोषणा की गई है, जिसका मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग के साथ-साथ कृषक समुदाय पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। सरकार ई.एल.आई. और उत्पादन-सम्बन्धित प्रोत्साहनों की अपनी असफल योजनाओं को जारी रखे हुए है, जिनसे बेहतर वेतन वाली नौकरियों सृजित करने में मदद नहीं मिली, बल्कि कॉर्पोरेट्स के हितों की पूर्ति हुई, तथा कुछ अन्य क्षेत्रों में प्रोत्साहनों के नए रूपों को जारी रखा जा रहा है।

बजट में एमएसएमई को ऋण सुविधाएं बढ़ाने की बड़ी-बड़ी बातें की गई हैं, लेकिन उन इकाइयों के पुनरुद्धार के लिए पर्याप्त पैकेज नहीं दिया गया है, जो योजनाबद्ध विमुद्रीकरण और जीएसटी नीतियों के कारण बंद होने को मजबूर हो गई।

कृषि संकट का समाधान नहीं किया गया है, बल्कि कुछ दिनों पहले घोषित नई योजना, जिसका नाम राष्ट्रीय कृषि विपणन पर राष्ट्रीय नीति ढांचा है, किसानों की परेशानियों को और बढ़ाएगी तथा उन्हें खेती से दूर कर देगी। मनरेगा के लिए धनराशि में आवश्यकतानुसार वृद्धि नहीं की गई है, न ही कार्य दिवस बढ़ाए गए हैं। केंद्रीय ट्रेड यूनियनों द्वारा शहरी रोजगार गारंटी योजना की मांग को भी नजरअंदाज कर दिया गया है।

यह कहना बहुत आसान है कि प्रवासन एक विकल्प होना चाहिए, लेकिन इसके लिए रोजगार सृजन में प्रत्यक्ष निवेश की आवश्यकता है। वित्त मंत्री ने इस संबंध में कुछ भी नहीं किया है, लेकिन विभिन्न क्षेत्रों के कर्मचारियों को कई प्रोत्साहनों की पेशकश की है और दावा किया है कि इससे नौकरियां पैदा होंगी। घोषित योजनाओं के क्रियान्वयन के सरकारी रिकार्ड से पता चलता है कि यह महज एक कल्पना बनकर रह जाएगी। सरकार केंद्रीय व राज्य सरकार के विभागों तथा सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में पूर्व-स्वीकृत पदों पर भर्ती करने को तैयार नहीं है, वहीं उसने रोजगार सृजन पर भी प्रतिबंध लगाया हुआ है।

सरकार परमाणु ऊर्जा परमाणु रिएक्टरों पर जोर दे रही है, जहां वह देश में बिजली उत्पादन और वितरण के तेजी से निजीकरण के कदमों के माध्यम से देश को जोखिम में डाल रही है।

ट्रेड यूनियनों ने धन जुटाने के लिए कॉर्परिट टैक्स में वृ‌द्धि, संपत्ति और उपहार कर लागू करने की मांग की थी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया गया, बल्कि इसके बजाय आम लोगों पर अप्रत्यक्ष कर और उपकर लगाकर उनका बोझ बढ़ा दिया गया। हम जानते हैं कि सरकार राजकोषीय घाटे को पूरा करने के लिए यह रास्ता अपनाती है।

"व्यापार करने में आसानी" के नाम पर सरकार नियोक्ता समर्थक, श्रमिक विरोधी श्रम संहिताओं को आगे बढ़ा रही है, जबकि एकाधिकार कॉर्परिट्स के लाभ के लिए नीतियां एक और बजट में परिलक्षित होती हैं। वित्त मंत्री द्वारा प्रावधानों को आपराधिक नहीं बनाने तथा उल्लंघनों में छूट देने की घोषणा वास्तव में ट्रेड यूनियन आंदोलन को कमजोर करने के उ‌द्देश्य से की गई है, जो देश के 57 करोड़ श्रमिकों की आवाज और हितों का प्रतिनिधित्व करता है। सरकार की मंशा बहुत स्पष्ट है कि व्यावसायिक सुरक्षा और श्रमिकों का स्वास्थ्य सरकार के एजेंडे से बाहर है, क्योंकि उसका इरादा निरीक्षण प्रणाली को समाप्त करने का है।

एटक ने बजट 2025-2026 के खिलाफ 05 फरवरी 2025 को अन्य केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के साथ देशव्यापी विरोध में शामिल होने का फैसला किया।

अमरजीत कौर

महासचिव

9810144958

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