*संत गाडगे बाबा महाराज का संक्षिप्त जीवन परिचय* *ब्यूरो चीफ मंंड़ल सुरेश कुमार कनौजिया/प्रमुख संवाददाता खुशबू कनौजिया गोंडा*
ब्यूरो चीफ मंंड़ल सुरेश कुमार कनौजिया/प्रमुख संवाददाता खुशबू कनौजिया गोंडाउत्तर प्रदेश
संत गाडगे बाबा का जन्म 23 फरवरी सन 1876 को महाराष्ट्र के अकोला जिले के खासपुर गांव में एक धोबी समाज में हुआ था। बाद में खासपुर गांव का नाम बदल कर शेणगांव कर दिया गया। गाडगे बाबा का बचपन का नाम डेबूजी था। संत गाडगे के देव सदृश सुन्दर एवं सुडौल शरीर, गोरा रंग, उन्नत ललाट तथा प्रभावशाली व्यकितत्व के कारण लोग उन्हें देख कर देव कहकर पुकारने लगे कालान्तर में यही नाम अपभ्रश होकर डेबुजी हो गया।
इस प्रकार उनका पूरा नाम डेबूजी झिंगराजी जाणोरकर हुआ। उनके पिता का नाम झिंगरजी माता का नाम सााखूबाई और कुल का नाम जाणोरकर था। गौतम बुद्व की भाति पीडि़त मानवता की सहायता तथा समाज सेवा के लिये उन्होनें सन 1905 को ग्रृहत्याग किया एक लकड़ी तथा मिट्टी का बर्तन जिसे महाराष्ट्र में गाडगा (लोटा) कहा जाता है लेकर आधी रात को घर से निकल गये। दया, करूणा, भ्रातृभाव, सममैत्री, मानव कल्याण, परोपकार, दीनहीनों के सहायतार्थ आदि गुणों के भण्डार डेबूजी सन 1905 मे ग्रृहत्याग से लेकर सन 1917 तक साधक अवस्था में रहे।
गाडगे बाबा डा. अम्बेडकर के समकालीन थे तथा उनसे उम्र में पन्द्रह साल बड़े थे। वैसे तो गाडगे बाबा बहुत से राजनीतिज्ञों से मिलते-जुलते रहते थे। लेकिन वे डा. आंबेडकर के कार्यों से अत्यधिक प्रभावित थे।
इसका कारण था जो समाज सुधार सम्बन्धी कार्य वे अपने कीर्तन के माध्यम से लोगों को उपदेश देकर कर रहे थे, वही कार्य डा0 आंबेडकर राजनीति के माध्यम से कर रहे थे। गाडगे बाबा के कार्यों की ही देन थी कि जहाँ डा. आंबेडकर तथाकथित साधु-संतों से दूर ही रहते थे, वहीं गाडगे बाबा का सम्मान करते थे। वे गाडगे बाबा से समय-समय पर मिलते रहते थे तथा समाज-सुधार सम्बन्धी मुद्दों पर उनसे सलाह-मशविरा भी करते थे। डा. आंबेडकर और गाडगे बाबा के सम्बन्ध के बारे में समाजशास्त्री प्रो. विवेक कुमार लिखते हैं कि ‘‘आज कल के दलित नेताओं को इन दोनों से सीख लेनी चाहिए।
एक दिन ढेबु जब खेत के अनाज की फसल पर बैठे पक्षियों को भगाते होते हैं, उस समय वहां से एक साधू गुजरते हैं। साधू उसकी हरकत को बड़े कुतुहल से देखता है। वह ढेबु से पूछता है, क्या वह उस अनाज का मालिक है ? ढेबु को एकाएक जैसे बोध होता है। वह क्या है, कौन है.....जगत क्या है... समाज क्या है ? और फिर, ढेबु घर छोड़ देते हैं। वह निकल पड़ते हैं, इन सब सवालों के उत्तर जानने। वह पैदल यात्रा करते हैं। एक गाँव फिर, दूसरा गाँव। तीसरा गाँव...चौथा,पांचवा। वह निरंतर चलता है। और फिर, उसके हाथ में आती है- झाड़ू।
यह भी एक संयोग है कि 29 वर्ष की आयु में तथागत बुद्ध ने भी 29 वर्ष में गृह त्याग किया था. डेबू जी के हाथ में लाठी दुसरे हाथ में मिट्टी का भिक्षा पात्र और शरीर पर फटे-पुराने चिथड़ों को गांठ-गांठ कर चीवर जैसा बना पहन कर चलि दये. बाबा जब किसी बस्ती के पास से गुजरते तो गांव भर के आवारा कुत्ते उन पर टूट पड़ते बाबा उनसे बचने की कोशिश करते फिर भी वह लहू-लुहान हो ही जाते.. मौसम की मार से बचने को बाबा फटे-पुराने चिथड़े पूरे जिस्म पर लपेटे रहते, एक हाथ में लाठी दुसरे में मिट्टी का ठीकरा ऐसी विचित्र वेशभूषा को देखकर कुत्तों का भौंकना, काटना लाजिमी ही था.
गाडगे बाबा ने अपने जीवन में किसी को शिष्य नहीं बनाया था। जिन्होंने बाबा के मार्ग पर चलने का प्रयास किया, वह पत्थर से देवता बन गए। बाबा स्वयं भी एक जगह पर नहीं रहे। अखंड भ्रमण ही करते थे। उनका कहना था कि साधु चलता भला, गंगा बहती भली।बाबा के सहयोगियों में सभी जातियों के लोग थे। बाबा के कीर्तन में गरीब-श्रीमत् सभी लोग आते थे। पैसे वाले डिब्बे भर-भर कर रूपए लाते और दान कर भोजन करके चले जाते। कंगाल भूखे पेट आते और कीर्तन सुन कर चले जाते थे। बाबा को यह बात पसंद नहीं थी। सात दिन का नाम सप्ताह और आखिरी दिन अन्नदान (भंडारा) करने के लिए बाबा कहते थे, कबीर कहते थे-
कबीर कहे कमला को, दो बाता लिख लें।
कर साहेब की बंदगी और भूखे को कुछ दें।।
संत गाडगे जी की 13 दिसंबर 1956 को अचानक तबियत खराब हुई और 17 दिसंबर 1956 को बहुत ज्यादा खराब हुई, 19 दिसंबर 1956 को रात्रि 11 बजे अमरावती के लिए जब गाड़ी चली तो गाड़ी में बैठे सभी से बाबा ने गोपाला-गोपाला भजन करने के लिए कहा। जैसे ही बलगांव पिढ़ी नदी के पुल पर गाड़ी आई बाबा मध्य रात्रि 12.30 बजे अर्थात 20 दिसंबर 1956 को यशकायी हो गया।
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