**29 मई, 1942 को एडोल्फ हिटलर के साथ नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के बीच विचार- विमर्श का 6 पृष्ठों की रिकॉर्ड के अंश को यहां क्रमशः दिया जा रहा है**ब्यूरो चीफ मंडल सुरेश कुमार कनौजिया गोंडा उत्तर प्रदेश*
ब्यूरो चीफ मंडल सुरेश कुमार कनौजिया गोंडा उत्तर प्रदेश
जिस लड़ाई में जर्मनी शामिल है उसका वे (फ्यूहरर) राजनीतिज्ञ की तरह प्रचार युद्ध के रूप में संचालन नहीं करते बल्कि अनिवार्यतया एक सैनिक की तरह शक्ति की राजनीति के साधन के रूप में संचालन करते हैं। इस संबंध में उन्होंने (फ्यूहरर ने) स्वयं कोई झूठी भविष्यवाणी नहीं करने के सिद्धांत पर चलना स्वीकार किया। उन्होंने कभी कोई ऐसा वादा नहीं किया, जो उनके सामर्थ से बाहर हो। आंतरिक मामलों में भी, वे हमेशा ऐसी विजय की भविष्यवाणी करने से बचे रहे, जो उनकी अपनी शक्ति की संभावनाओं से परे हो।
इन कारणों से उन्होंने इस समय मिश्र के बारे में कोई भविष्यवाणी नहीं की। रोमेल ने जिस दिन हमला किया तब से वे स्पष्ट रूप से नहीं देख सके कि क्या यह अभियान ब्रिटिश मोर्चे का विखंडन करेगा। लेकिन जर्मनी की ताकत में जो कुछ होगा, वह हर हालत में किया जाएगा। वह अपने खून और पसीने से अधिक कुछ नहीं दे सकता। अगर रोमेल को सीमित सफलता ही मिलती है, तो मिश्र के भाग्य के बारे में कोई व्यापक वक्तव्य देने से नुकसान ही होगा। लेकिन अगर रोमेल अपने शत्रु को हराने में सफल होता है तो, इस संबंध में आवश्यक निष्कर्ष निकाला जा सकता है। तब वे (फ्यूहरर) मिस्रवासियों से तुरंत ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने की अपील करेंगे। तब वह साफ मन से मिस्र की जनता को ऐसी अपील कर सकते हैं ; क्योंकि ऐसी अपील के पीछे जर्मन शक्ति- साधन होंगे।
वे (फ्यूहरर) हमेशा विदेशी ताकतों को जबर्दस्ती उखाड़ फेंकने के लिए घोषणा करने के बारे में सावधान रहे हैं। अपने देश ऑस्ट्रिया के मामले में इसलिए उन्होंने 12 मार्च, 1938 को, अर्थात मार्च करने के एक दिन पहले ऑस्ट्रियावासियों के लिए घोषणा जारी की थी। कोई राजनीतिज्ञ अगर चाहता है कि लोग उसे गंभीरता से लें, तो वह किसी और तरीके से काम नहीं कर सकता है।
अरब के सवाल के मामले में उनका वही रूख है। अगर जर्मनी दक्षिण काकेसस पहुंच गया होता और अगर उसके पास मिस्री और अरब क्रांतिकारियों को मदद भेजने के लिए आधा दर्जन वख्तरबंद डिवीजन और कुछ मोटर- सज्जित डिवीजन होते, तो वे अरबों के बारे में घोषणा जारी करने से न हिचकते। लेकिन अभी, जब जर्मनी अब भी अरबिया से एक हजार किलोमीटर दूर है, ऐसी घोषणा गैर जिम्मेदाराना होगी। वे. (फ्यूहरर) अंग्रेज नहीं है। वे घोषणाओं के जरिये दूसरे राष्ट्रों को बरबाद करना नहीं चाहते। वे मिस्र और क्रांतिकारी अरबों की हार के लिए काम नहीं कर रहे हैं, बल्कि वास्तविक सफलता प्राप्त करने में उनकी मदद करना चाहते हैं। वे नहीं चाहते कि उनके द्वारा कोई भिन्न अभियान चलाया जाए, जैसा कि अंग्रेज करते। जर्मनी अपने उद्देश्य के लिए अपना ही खून देगा।
इन परिस्थितियों में मिस्र को अपील जारी करने पर विचार करने का समय तीन महीने में या फिर एक या दो वर्ष में आएगा, लेकिन किसी भी हालत में मिस्र की मुक्ति सुनिश्चित करने के लिए उसके द्वार पर पर्याप्त युद्ध- शक्ति जमा करने के बाद ही। यही बात अरब पर भी लागू है।
भारत जर्मनी से अपार दूरी पर है। भारत के साथ थल या वायु मार्ग से ही यातायात- संबंधों की संभावनायें हैं। अगर दक्षिण का रास्ता चुना जाए तो फारस की खड़ी होकर थल संपर्क होगा ; लेकिन उत्तर में अफगानिस्तान होकर। किसी भी हालत में यह मार्ग रूस की लाश पर से ही गुजरेगा।........ (क्रमशः)
['नेताजी संपूर्ण वाङमय' के खण्ड-11, पृष्ठ - (89 व 90) से यहां उद्धृत।]
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