*करनैलगंज - क्या सकरौरा घाट को मिलेगा कोई भागीरथ**गोंडा करनैलगंज उपेक्षा का दंश झेल रहे प्रसिद्ध सकरौरा घाट के दिन भी कभी बहुरेंगे या नहीं? स्थानीय लोगों सहित यहां आने वाले श्रद्धालुओं के मन में यह एक यक्ष प्रश्न बना हुआ है* *ब्यूरो मंडल प्रभारी सुरेश कनौजिया संवाददाता शिव कुमार कनौजिया गोंडा*
ब्यूरो मंड़ल प्रभारी सुरेश कनौजिया/संवाददाता शिव कुमार कनौजिया गोंडा
देवीपाटन मुख्यालय से लगभग 32 किलोमीटर की दूरी पर करनैलगंज पर स्थित प्रसिद्ध सकरौरा घाट तीन दशकों से भी अधिक समय से उपेक्षा का दंश झेल रहा है। काफी बड़े क्षेत्रफल में बसा सकरौरा घाट एक सुरम्य स्थान हुआ करता था। यहां स्नान के लिए अलग-अलग पुरुष और महिला घाट तथा पक्की सीढ़ियां बनी हुई हैं। घाट पर कई मंदिर और धर्मशालायें भी बनी हुई थीं। नगर तथा ग्रामीण क्षेत्रों के तमाम लोग प्रतिदिन वहां सरयू स्नान करने पहुंचते थे। पर्व और त्यौहारों पर बड़े-बड़े मेले भी लगते थे। सकरौरा घाट का कार्तिक पूर्णिमा मेला आज भी लोगों को याद है। लगभग तीन दशक पूर्व सरयू नदी कि धारा मुड़कर लगभग एक किमी. दक्षिण की ओर चली गयी। इससे स्नान के लिए घाट पर जल न होने से श्रद्धालुओं का आना धीरे-धीरे कम होता गया और सकरौरा घाट वीरान होने लगा। देखरेख के अभाव में तमाम मंदिर और धर्मशालायें गिर गयीं, मूर्तियां चोरी हो गयीं, वहां लगे पेड़ों को चोर काट ले गये तथा घाट निर्जन होकर चोर उचक्कों का अड्डा बनकर रह गया। जनता की मांग पर इसकी प्रतिष्ठा वापस लाने के लिए पर्यटन विभाग ने स्नान के लिए एक पोखरा बनवा दिया पर देखरेख न होने से उसकी बाहरी रेलिंग धराशाई हो गयी और पोखरे में कभी विभाग द्वारा पानी नहीं भरा गया। वर्ष 2004 में तत्कालीन राज्यमंत्री और क्षेत्रीय विधायक योगेश प्रताप सिंह ने सरयू को नहर रूप में लाने के लिए लगभग 30 लाख रुपये लागत वाली सकरौरा घाट योजक सरयू ड्रेन का निर्माण प्रारम्भ कराया पर ठेकेदार आधा अधूरा काम छोड़कर गायब हो गया। लगभग एक वर्ष पूर्व भाजपा शासनकाल में भी यह कार्य प्रारम्भ हुआ लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात वाला ही रहा। तब से आज तक लोग सकरौरा घाट पर पुन: सरयू के आगमन की आस संजोये बैठे हैं पर उनकी यह आस कभी पूरी होगी या नहीं, यह कोई नहीं जानता। फिलहाल सकरौरा घाट के उद्धार के लिए क्षेत्र को किसी भगीरथ की तलाश है।
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