*सीटू ने मजदूर-विरोधी, जन-विरोधी विनाशकारी बजट की निंदा की**ब्यूरो मंड़ल प्रभारी सुरेश कनौजिया/नगर संवाददाता शिव कुमार कनौजिया गोण्डा*






ब्यूरो मंड़ल प्रभारी सुरेश कनौजिया/नगर संवाददाता शिव कुमार कनौजिया गोण्डा

आज संसद में पेश किया गया 2022-23 का बजट कोरा शोर-शराबा ही है जो वास्तविकता से परे है। एक दिन पहले पेश किए गए आर्थिक सर्वेक्षण की निरंतरता में भी बजट, आजीविका का भारी नुकसान, कमाई में कमी, गहन दरिद्रता और सुनियोजित मूल्य-वृद्धि के बीच तीव्र भूख के रूप में अकल्पनीय दुखों के प्रति क्रूर असंवेदनशीलता को दर्शाता है जिसकी शिकार बहुसंख्यक आबादी है, वहीं मुट्ठी भर बड़े कॉरपोरेट तबके द्वारा भारी संपत्ति को लूटा जा रहा है। जिसके चलते भयंकर असमानता बन गयी है, जो किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता है। वित्त मंत्री के भाषण में तथाकथित ‘‘समावेशी विकास’’, ‘‘वित्तीय समावेशन’’ का कथन भाजपा सरकार के बेशर्म पाखंड प्रदर्शन के अलावा और कुछ नहीं है।

बजट को बुनियादी ढाँचे, विनिर्माण और खनिज क्षेत्रों को पूरी तरह बेच देने की हताशापूर्ण कोशिश और विनाशकारी सम्पूर्ण निजीकरण अभियान की पृष्ठभूमि में प्रस्तुत किया गया है, जिसमें राष्ट्रीय सम्पŸिायों व संसाधनों को देशी-विदेशी निजी हाथों में हस्तांतरण की सुविधा दी है। वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण की शुरुआत में ही टाटा को नेशनल कैरियर एयर इंडिया और नीलाचल इस्पात की सफल सौदेबाजी के लिए खुद की पीठ थपथपायी और राज्य के स्वामित्व वाली पूँजीगत संपत्तियों को निजी क्षेत्र की देशी-विदेशी कम्पनियों के हाथों में स्थानांतरित करने के सरकार के संकल्प को दोहराया। वास्तव में तो, मोदी शासन के तहत, आर्थिक नीति निर्माण की प्रक्रिया को धीरे-धीरे संसदीय दायरे से बाहर किया जा रहा है और वर्तमान बजट राष्ट्रीय हितों के खिलाफ उसी सत्तावादी और जन-विरोधी विनाशकारी प्रवृत्ति को प्रकट करता है।

इस पृष्ठभूमि में, बजट के आंकड़े उत्पादक रोजगार सृजन के लिए बढ़े हुए पूँजीगत व्यय के शोर-शराबे से मेल नहीं खाते, जिसका दावा बजट भाषण में किया गया है। 2022-23 में प्रभावी पूँजीगत व्यय बजट 1.06 लाख करोड़ रुपये है, जो 2021-22 में इसी मद पर वास्तविक व्यय की तुलना में मामूली और नगण्य वृद्धि को दर्शाता है, और मुद्रास्फीति के प्रभाव के कारण बड़े पैमाने पर निष्प्रभावी हो रहा है। वास्तव में, 2022-23 के लिए प्रभावी पूँजीगत व्यय पिछले वर्ष की वास्तविक पूँजी प्राप्ति से लगभग 63,000 करोड़ रुपये कम है। और यहाँ तक कि बुनियादी ढाँचे और रसद के विकास के लिए राष्ट्रीय राजकोष से निकाला गया यह बजटीय पूँजीगत व्यय ज्यादातर निजी कॉरपोरेट्स के माध्यम से किया जाएगा जैसा कि मंत्री ने अपने भाषण में बार-बार जोर दिया है; राष्ट्रीय मौद्रीकरण पाइपलाइन की परियोजना की घोषणा पहले ही कर दी गई है, जो सार्वजनिक धन-संपत्ति के इस तरह के व्यवस्थित निकासी के कार्यक्रम को प्रकाश में लाने के लिए निजी कॉरपोरेट सौंपन के लिए लाया गया है।

अर्थव्यवस्था में उपभोग व्यय में भारी गिरावट की पृष्ठभूमि में, ज्यादातर मेहनतकश आबादी को पूर्ण संकट का सामना करना पड़ा, समय की आवश्यकता कल्याण और सामाजिक मदों पर व्यय में वृद्धि के माध्यम से एक आक्रामक माँग-वृद्धि के उपायों की रही है और रोजगार सृजन के कार्यक्रम पर ध्यान केन्द्रित किया गया है। । लेकिन अपने वर्ग चरित्र और बड़े-कॉरपोरेटस् की दासता के लिए ही है, सरकार बिल्कुल विपरीत दिशा में आगे बढ़ी है। पांच साल में 60 लाख अतिरिक्त रोजगार सृजन का दावा महज एक छलावा है।

बजट ने सभी मोर्चों पर अपने जनविरोधी संकुचनकारी चरित्र को उजागर किया। वित्त मंत्री के बजट भाषण के अनुसार जीएसटी संग्रह में भारी वृद्धि के बावजूद, प्रधान मंत्री के नाम पर तथाकथित कल्याणकारी योजनाओं के लिए 3.19 लाख करोड़ रुपये के 2022-23 में होने वाले राजस्व व्यय में 1 फीसद से भी कम की वृद्धि हुई है। उन वस्तुओं में से कुछ पर विशिष्ट होने के लिए, मनरेगा के लिए आवंटन पिछले वर्ष के 98,000 करोड़ रुपये से घटाकर 73,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है; व्यापक रुप से बढ़ती भूख की तीव्रता के सामने, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत खाद्य सब्सिडी में 30 फीसद की कमी की गई है; ईंधन की आसमान छूती कीमतों को देखते हुए उर्वरक सब्सिडी में भी 25 प्रतिशत और पेट्रोलियम सब्सिडी में 11 प्रतिशत की भारी कटौती की गई है। यहाँ तक कि मिड-डे-मील योजना (जिसे अब पीएम-पोषन नाम दिया गया है) के आवंटन में भी 1,267 करोड़ रुपये की भारी कटौती की गयी है।

इसी तरह, धान और गेहूं के लिए एमएसपी के आवंटन में 11,000 करोड़ रुपये की कमी की गई है; पीएम फसल बीमा योजना, पीएम-किसान योजना, फसल पालन, आदि के लिए आवंटन में भारी कटौती की गयी है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन और आंगनवाड़ी (आईसीडीएस) के लिए, आवंटन में कोई वृद्धि नहीं हुई है, जिसका अर्थ है कि अगर मुद्रास्फीति को ध्यान में रखा जाए तो कटौती ही हुई है। ऐसे कई अन्य उदाहरण भी हैं।

बजट ने महामारी के दौरान मेहनतकश जनता की आजीविका और कमाई के नुकसान के रूप में और साथ ही व्यापक रूप से और रोजगार के अनौपचारिकीकरण के रूप में कामकाजी जनता के दुखों की परवाह नहीं की है। सभी के लिए सार्वभौमिक रूप से सामाजिक सुरक्षा के राहत और विस्तार की माँगों के बावजूद, बजट वास्तव में देश की धन-सम्पŸिा पैदा करने वाली मेहनतकश जनता के लिए नकारात्मक ही रहा है। बल्कि सरकार खाद्य सब्सिडी में भारी कटौती के अलावा, ईंधन की कीमतों सहित सभी आवश्यक वस्तुओं के मूल्य वृद्धि के साथ-साथ अप्रत्यक्ष करों के बढ़ते बोझ के माध्यम से मेहनतकश जनता को क्रूरता से निचोड़ने का रवैया ही है।

दूसरी ओर, सरकार अपने कॉरपोरेट आकाओं को रियायतें देने में उदार है। अनुपालन की सुविधा के लिए कर प्रशासन को और सरल बनाने के उपायों के नाम पर, वर्तमान बजट में सरकार वास्तव में छूटें देने में लिप्त है, बल्कि आदतन चूक करने वाले और कर-चोरी करने वाले कॉरपोरेट समुदाय द्वारा कर-चोरी को बढ़ावा दे रही है। बजट के साथ परिचालित दस्तावेजों के अनुसार, 2020-21 में कॉरपोरेटस् को प्रोत्साहन के रूप में कर रियायतें 72,041 करोड़ रुपये थी, जो कि उसी बड़े-व्यापारी वर्ग द्वारा 4.05 लाख करोड़ रुपये की कर चोरी से अधिक थी। देश और जनता के खिलाफ इस तरह के अपराध को सक्ष्ती से रोकने की बजाय उसमें और भी शामिल है।

सीटू का मानना है कि वर्तमान बजट पूरी तरह से जनविरोधी है और जहाँ तक राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था का सम्बन्ध है, उसके लिहाज से पूरी तरह से विनाशकारी है। मजदूर वर्ग को विनाशकारी नीति व्यवस्था का विरोध करना चाहिए और देश भर में एकजुट प्रतिरोध संघर्ष के माध्यम से जोर देना चाहिए।

इस विनाशकारी जनविरोधी नीति व्यवस्था के खिलाफ 28-29 मार्च 2022 को दो दिवसीय देशव्यापी आम हड़ताल की ओर आगे बढ़ें।

जारीकर्ता   
तपन सेन
महासचिव

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