*यादें**ऐसी भी राजनीतिः पेश की सिद्धांतों की मिसाल, नौकरी छोड़कर संघर्ष का अपनाया रास्ता**ब्यूरो मंडल प्रभारी सुरेश कनौजिया प्रमुख संवाददाता खुशबू कनौजिया गोंडा*




ब्यूरो मंडल प्रभारी सुरेश कनौजिया प्रमुख संवाददाता खुशबू कनौजिया गोंडा

जब कांग्रेस का प्रचार न करने पर गंवानी पड़ी शिक्षक की नौकरी की

तेज प्रताप सिंह

गोंडा। राजनीति में सिद्धांतों को तिलांजलि देने वालों का इतिहास रहा है कि वे जिस पार्टी को उभरता देखते हैं, उसी ओर बढ़ लेते हैं। जब कमजोर लगती है तो तीसरी का दामन थाम लेते हैं। आज की राजनीति में ईमानदारी, जिम्मेदारी व समझदारी जैसे नैतिक गुणों का कोई महत्व नहीं गुजरे जमाने में सिद्धांतवादी राजनीति के पक्षधर वामपंथी विचारधारा से जुड़े कर्मचारी नेता सत्य नारायण त्रिपाठी ने पूरे देश पर राज कर रही कांग्रेस के आफर को ठुकराते हुए साल 1967 के आम चुनाव में कांग्रेस का प्रचार करने से इंकार करते हुए शिक्षक की सम्मानित नौकरी छोड़ दी थी।

ईमानदारी और सरल स्वभाव के लिए विख्यात सत्य नारायण त्रिपाठी का जन्म एक जनवरी 1943 को जिले के सदर तहसील क्षेत्र में सिंधवापुर गांव में पिता राम अभिलाख त्रिपाठी और माता सुब्बा देवी के घर हुआ था चार भाई और दो बहनों में सबसे बड़े सत्य नारायण त्रिपाठी ने पत्नी के निधन के बाद आजीवन अकेले रहकर समाजसेवा करने का व्रत लिया। गांव बसालतपुर में प्रारंभिक

शिक्षा, जिला मुख्यालय के टामसन इंटर कॉलेज से इंटरमीडिएट और बलरामपुर के एमएलके कॉलेज से 1964 में स्नातक उत्तीर्ण करने के बाद त्रिपाठी को बाबागंज के संत सहजवन उच्चतर माध्यमिक विद्यालय (अब संत सहजवन इंटर कॉलेज) में शिक्षक की नौकरी मिल गई। सत्य नारायण त्रिपाठी बताते हैं कि एमएलके कॉलेज बलरामपुर में पढ़ाई के

दौरान प्रख्यात आरएसपी नेता केशव प्रसाद शुक्ला और सांसद कामरेड झारखंडे राय के सानिध्य से उनके मन में समाजसेवा के भाव अंकुरित हुए। 1962 में झारखंडे राय और ● प्रस्तावक बनकर उन्हें स्टूडेंट फेडरेशन की सदस्यता दिलाई। छात्र भी किया। उन्होंने कभी छात्रसंघ के चुनाव में भागीदारी नहीं की,

कर्मियों के हित के लिए छेड़ा संघर्ष

कौन हैं सत्य नरायन त्रिपाठी

नौकरी से त्यागपत्र के बाद का. सत्य नारायण त्रिपाठी राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद के बैनर तले कर्मचारी हितों की लड़ाई लड़ने लगे। वह बताते हैं कि साल 1962 में बलरामपुर से जब कांग्रेस के टिकट पर सुभद्रा जोशी चुनाव लड़ रहीं थीं तब वामपंथियों का उन्हें समर्थन था। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के बड़े नेता और सुभद्रा जोशी के पति बीडी जोशी के निर्देश पर उन्होंने जवाहर लाल नेहरू एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के 15-15 छात्र नेताओं की टीम के साथ रात दिन जुटकर प्रचार कर जितवाया था। 1967 में सुभद्रा जोशी बलरामपुर से दोबारा लोकसभा का चुनाव लड़ रहीं थीं तो न वामपंथी दलों का उन्हें समर्थन था और न ही उनके पति बीडी जोशी उनका समर्थन कर रहे थे। संत सहजवन स्कूल के प्रबंधक और मुजेहना के विधायक महंथ दीप नरावन वन ने कहा कि वे कांग्रेस प्रत्याशी सुभद्रा जोशी का प्रचार करें। उन्हें ऊंचे ओहदे का भी आफर दिया गया। स्टूडेंट फेडरेशन में होने से उन्होंने किया और प्रचार में नहीं गए। यही नहीं कामरेड सरजू पांडेय ने राजनीति का भारंभ लेकिन छात्रों के बीच उन्होंने अन्य शिक्षकों के प्रचार में जाने पर विरोध किया। उनके लोकप्रियता परवान चढ़ी। और प्रबंधन के बीच तल्खी बढ़ी और उन्होंने त्यागपत्र दे दिया।

*कई बार जा चुके*

हैं जेल
गरीबों और कर्मचारियों के हितों की लड़ाई लड़ते हुए कईबार जेल जा चुके त्रिपाठी ने अपना घर बार त्याग समाज के वंचितों शोषितों और कर्मचारी हितों की लड़ाई लड़ रही ट्रेड यूनियन के लिए पूरा जीवन समर्पित कर दिया। लोगों को आजीविका मुहैया कराकर और बड़ी संख्या में कर्मचारियों को उनका वाजिब हक दिलाकर उनके जीवन में उजाला लाने और ईमानदारी के साथ तपस्वी जीवन जीने वाले सत्य नारायण त्रिपाठी की आज भी जिले में अलग पहचान है।

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