गाय पर वीर सावरकर का मत-- 9552‘विज्ञाननिष्ठ निबंध ब्यूरो मंडल प्रभारी सुरेश कनौजिया/संवाददाता शिव कुमार कनौजिया गोण्डा




ब्यूरो मंडल प्रभारी सुरेश कनौजिया/संवाददाता शिव कुमार कनौजिया गोण्डा

एक तरफ गायें और छुट्टा सांड़ फसलों को चरकर किसानों की आय दोगुनी करने पर उतारू है तो दूसरी तरफ गौ रक्षक एक समुदाय विशेष की जनसंख्या को आधी करने पर। ऐसे में गौ भक्त अगर अपने ही महापुरुष वीर सावरकर जी के एक निबंध 'विज्ञाननिष्ठ निबंध' पढ़ लेते गायों का भी भला हो जाता और इंसानों का भी। निबंध के कुछ अंशों को उद्धृत कर रहा हूँ।

गाय की देखभाल करो, उसकी पूजा नहीं-
        1930 के दशक की बात है। मराठी भाषा के प्रसिद्ध जर्नल 'भाला' से पूछा गया, "वास्तविक हिंदू कौन है? 
"वह, जो गाय को अपनी माता मानता है!" उनका जवाब था।
इसके जवाब में सावरकर ने एक निबंध  ‘विज्ञाननिष्ठ निबंध’ लिखा। इसमें उन्होंने लिखा,  'गोपालन हवे, गोपूजन नव्हे' अर्थात 'गाय की देखभाल करो, उसकी पूजा नहीं।' वह आगे लिखते हैं, "अगर गाय किसी की भी माता हो सकती है, तो वह सिर्फ बैल की। हिंदुओं की तो कतई नहीं। गाय के पैरों की पूजा करके हिंदुत्व की रक्षा नहीं की जा सकती है। गाय के पैरों में पड़ी रहने वाली कौम संकट के आभास मात्र से ढह जाएगी।"
वैज्ञानिक सिद्धांतों पर हो गाय का संरक्षण-
          वीर सावरकर के अनुसार गाय एक उपयोगी जानवर तो है, लेकिन उसकी पूजा का कोई मतलब नहीं है। तर्क देते हुए उन्होंने कहा था कि इंसान को उसकी पूजा करनी चाहिए जो उससे बड़ा हो या जिसमें इंसानों से कहीं अधिक गुणों की खान हो। हिंदुओं का पूज्य एक ऐसा जानवर तो कतई नहीं हो सकता है जो मानवता के लिहाज से कहीं पिछड़ा जानवर है। सावरकर ने गाय की पूजा को 'अज्ञानता से प्रेरित आचरण' करार देते हुए कहा था, "यह प्रवृत्ति वास्तव में 'बुद्धि हत्या' है।" मगर वीर सावरकर गाय के संरक्षण के भी खिलाफ नहीं थे, बल्कि उन्होंने गाय के संरक्षण को राष्ट्रीय जिम्मेदारी करार दिया था। हालांकि उनका कहना था कि गाय का संरक्षण आर्थिक और वैज्ञानिक सिद्धांतों के आधार पर होना चाहिए। इस संदर्भ में सावरकर ने अमेरिका का उदाहरण दिया था, जहां अधिसंख्य पशु उपयोगी साबित होते हैं।
       इसके साथ ही वीर सावरकर ने गोमूत्र के सेवन और कुछ मामलों में गाय के उपलों के सेवन पर भी घोर आपत्ति दर्ज कराई थी। उनका मानना था कि यह चलन प्राचीन भारत में बतौर सजा शुरू हुआ होगा और आधुनिक संदर्भों में इसके लिए कतई कोई स्थान नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने कट्टर हिंदुओं की अपने बारे में धारणा में सफाई भी अद्भुत अंदाज में दी थी। सावरकर ने तर्क दिया था कि गाय की पूजा नहीं करने की बात कहकर उन्होंने गुनाह किया है। एक तरह की ईशनिंदा की है, लेकिन कट्टर हिंदुओं का गुनाह तो उनकी तुलना में कहीं ज्यादा बड़ा है, जो मानते हैं कि 33 करोड़ देवी-देवता गाय के पेट में समाए हैं।
गाय सिर्फ एक उपयोगी जानवर-
        सावरकर ने अपनी किताब में लिखा है, "ईश्वर सर्वोपरि है। उसके बाद मनुष्य का स्थान है, और फिर पशु हैं। गाय के बारे में लिखा गया है कि गाय एक ऐसा पशु है जिसके पास मूर्ख से मूर्ख इंसान जैसी भी बुद्धि नहीं होती। गाय को दैवीय कहते हुए मनुष्य से इसे ऊपर मानना अपमान है। जब आप गाय की पूजा करते हैं तो आप मानव जाति का स्तर नीचे गिराते हैं।" उन्होंने आगे लिखा है कि गाय पूज्य है, जैसी मूर्खतापूर्ण बातों ने देश को बहुत हानि पहुंचाई है। हिंदू साम्राज्यों को इस मान्यता की वजह से कई बार हार का सामना करना पड़ा। क्योंकि वे गाय की हत्या नहीं कर सकते थे। मुसलमानों ने गाय को ढाल की तरह इस्तेमाल किया, क्योंकि उन्हें इस बात पर पूरा भरोसा था कि हिंदू गाय का जरा भी नुकसान नहीं पहुंचाएंगे। अंत में सावरकर ने लिखा है कि विज्ञान हमें बताता है कि गाय उपयोगी है, इसलिए हमें उसे नहीं मारना चाहिए। लेकिन यदि वह मनुष्य की भलाई के लिए अहितकर साबित हो तो, उसे मारा भी जा सकता है।
       हालांकि सावरकर ने गाय के प्रति खुद को समर्पित भी कहा, लेकिन इसके पीछे उन्होंने गाय के उपयोगी होने का तर्क दिया। उन्होंने कहा कि अगर गाय का सर्वोत्तम उपयोग करना है तो उसकी अच्छी देखभाल करनी पड़े।
    
नोट- वीर सावरकर का यह निबंध गूगल से लिया है। चाहें 
        तो आप भी खोजकर पढ़ सकते हैं। गूगल में 
         उपलब्ध हैं।

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