*अपनी चाह और राह में बाधक तिनकों तक से डरता है कट्टरपंथ**ब्यूरो मंडल प्रभारी सुरेश कनौजिया नगर संवाददाता शिव कुमार कनौजिया गोंडा
ब्यूरो मंडल प्रभारी सुरेश कनौजिया नगर संवाददाता शिव कुमार कनौजिया गोंडा
कट्टर हिंदूवादियों द्वारा जब मुस्लिम अथवा ईसाई धर्म के अनुयायियों की आस्था पर प्रहार किया जाता है तो कट्टर धर्मनिरपेक्ष लोगों को छोड़, आम हिन्दू/ उदार हिन्दू खुश होता है। वह भूल जाता है कि कट्टरता उसके साथ भी वही व्यवहार करेगी जो कि वह अपने राजनैतिक लक्ष्यों के लिये अन्य धर्माबलम्बियों के साथ करती आई है।
हिन्दू धर्म (हिंदुत्व नहीं) उसके उदार अवयवों के कारण आज भी असंख्य लोगों का प्रमुख विश्वास बना हुआ है। असंख्य हिंदू हैं जो मन्दिरो में दर्शनों की भांति ही पीर - मजारों में आस्था रखते हैं और अपने अपने तरीकों से पूजा अर्चन कर अपने संकटों के निदान और खुशहाली की कामना करते हैं।
हमारे देश के कोने कोने में ऐसे मजारों की संख्या अनगिनत है। खुद मेरे अपने खेत में एक मिट्टी का टीला सदियों से बना हुआ है जिसे 'सैय्यद बाबा' कहते हैं और हजारों आस्थावान आज भी वहां पूजन अर्चन करते हैं। मेरे पिताजी भी इस मजार के बारे में बस इतना ही जानते थे कि वहां हमेशा से सैयद बाबा का टीला है और उनके भक्त अधिकतर हिंदू हैं।
अंग्रेजी हुकूमत ने भी हिन्दूधर्मावलम्बियों की आस्था पर चोट करने से सदा परहेज किया। पर हिंदुओं की सरकार होने का दाबा करने वाली भाजपा सरकार और उसके पोषित गिरोह इस आस्था पर भी चोट करने लगे हैं। उद्देश्य है सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे फिर से सत्ता हासिल करना।
एटा जिले के कस्बे जलेसर में एक दैनिक मजदूरी करने वाला हिन्दू परिवार किसी जलेसर बाबा (पीर बाबा) के प्रति आस्थावान था। अपनी आस्था के वशीभूत होकर उसने अपने घर के अंदर दो मजारें बनवा रखीं थीं। मजारें क्या सीमेंट से ढके दो चबूतरे थे। परिवार के सात सदस्य वहीं पूजा- अर्चन करते थे।
पर उनकी इस आस्था पर बजरंग दल की कुदृष्टि पड़ गयी। हां हां, वही बजरंगदल जो कहीं भी नहीं दिखाई दिया जब लोग आक्सीजन और दवा के अभाव में तड़प तड़प कर मर रहे थे।
अभियान चलाया गया कि यह लोगों को मुसलमान बनाने का षडयंत्र । है। स्थानीय पुलिस को ही नहीं CM और PM तक को ट्वीट कर डाले गये। स्थानीय पुलिस की क्या औकात कि वो सत्ताधारियों की मंशा को पूरा न करे। और मजार ढहा दी गई।
उस गरीब परिवार के मुखिया की बेबसी और आस्था पर लगी चोट को एक अंग्रेजी दैनिक ने उसीके शब्दों में प्रकाशित किया है। मैं उसका हिंदी अनुवाद शब्दशः प्रस्तुत कर रहा हूं-
" हमने एक साल पहले ये मजारें बनवायी थीं क्योंकि हम 'पीर' में गहरी आस्था रखते थे: हमने कुछ भी गलत नहीं किया.... हमने किसी की भी जमीन पर अतिक्रमण नहीं किया। पर कल पुलिस ने हमसे उन्हें हटाने को कहा। उन्होंने कहाकि सांप्रदायिक तनाव रोकने के लिए यह आवश्यक है। मैं एक छोटा आदमी हूँ। मैं किसी से लड़ नहीं सकता," दैनिक मजदूरी कर कमा कर खाने वाले जयपाल सिंह ने कहा।
जयपाल सिंह की पीड़ा और बेबसी बहुत कुछ कह जाती है। यह आज के सत्ताधारियों के कुत्सित इरादों और उनके हिंदुत्व के मुखौटे को उघाड़ कर सामने रखने का प्रसंग हो सकता है जो शायद आपको भी सोचने को मजबूर करे।
डा. गिरीश।
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