*भाकपा का प्रेस बयान**बाबारामदेवऔरआदित्यनाथकीपुस्तकोंकोपाठ्यक्रमों शामिल कराना शिक्षा के सांप्रादायीकरण और भगवाकरण की कोशिश**भाकपा ने इस शिक्षा और छात्रविरोधी निर्णय को रद्द कराने की मांग राज्यपाल महोदय से की*
ब्यूरो मंडल प्रभारी सुरेश कनौजिया ब्यूरो चीफ खुशबू कनौजिया गोंडा
लखनऊ- 1 जून 2021, मेरठ विश्वविद्यालय द्वारा बाबा रामदेव के योग और योगी आदित्यनाथ के हठयोग संबंधी पुस्तकों को दर्शन शास्त्र के पाठ्यक्रम में शामिल करने का फैसला अकादमिक नहीं, विशुध्द राजनैतिक है जो विश्वविद्यालय के बोर्ड ऑफ स्टडीज द्वारा राज्य सरकार के निर्देशों के अनुपालन में लिया गया है। श्री दीन दयाल उपाध्याय के राजनैतिक विचारों को एक अन्य विषय में शामिल किया गया है।
यह सीधे सत्तापक्ष की विचारधारा और राजनीति को छात्रों के दिमाग में बैठाने का प्रयास है, जिसका निर्णय उत्तर प्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा विभाग ने पहले ही ले लिया था।
यदि इस फैसले को जनविरोध के द्वारा रद्द नहीं कराया गया तो वो दिन दूर नहीं जब आरएसएस का वैचारिक ग्रंथ 'बंच ऑफ थॉट' (विचार नवनीत) भी पाठ्यक्रमों में शामिल कर दिया जायेगा और संघ शाखाओं में बांटे जाने वाले सांप्रदायिक जहर को सरकारी (जनता के) खर्चे पर छात्रों के मस्तिष्क में ठूंसा जायेगा।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के राज्य सचिव मंडल ने शिक्षा के सांप्रदायीकरण एवं भाजपाईकरण के इस प्रयास की कड़े शब्दों में निन्दा की है और प्रदेश के राज्यपाल महोदय से इसे रदद् कराने की मांग की है।
भाकपा राज्य सचिव मंडल ने कहाकि अब तक महर्षि पतंजलि का योग दर्शन ही दर्शनशास्त्र के पाठ्यक्रमों का हिस्सा रहा है। महर्षि पतंजलि का योग दर्शन ही योग दर्शन का मूल है, जिसके विषय में एक से एक बड़े स्कालर्स की पुस्तकें उपलब्ध हैं।
बाबा रामदेव और आदित्यनाथ तो इस दर्शन के मूलमंत्र- 'योगः चित्तवृत्ति निरोधः' से कोसों दूर हैं। वे हम सबकी तरह सांसारिक प्राणी हैं। एक व्यापारी हैं तो एक सत्ता के पुजारी। दोनों में से कोई भी न तो योग की कसौटी पर खरा उतरता है न योग अथवा हठयोग का विद्वान है। ऐसे में इनके द्वारा रचित पुस्तकों को विश्वविद्याल के पाठ्यक्रम में घुसाना निहित राजनैतिक स्वार्थों से प्रेरित है, और भाजपा सत्ता में आने के दिन से ही इस काम में जुटी है।
भाकपा ने कहा कि यह हमारे करदाताओं के धन के बल पर सांप्रदायिक- राजनीतिक विचारधारा को फैलाने का षडयंत्र है। यह शिक्षा और संकृति के भगवाकरण का प्रयास है। इसका सभी को विरोध ही नहीं, मुखर विरोध करना चाहिए। अकादमीशियन, बुध्दिजीवियों, छात्रों, अभिभावकों और राजनैतिक दलों को अवश्य ही आगे आकर प्रतिरोध जताना चाहिये।
जिन टैक्सपेयर्स का गुस्सा JNU पर उबाल खाता था, आशा है वे भी आगे आयेंगे।
भाकपा उत्तर प्रदेश इस फैसले पर गहरा विरोध जताती है। राज्य सरकार को अपनी इन करतूतों से बाज आना चाहिए। उन्हें समझना चाहिए कि अगली सरकार उनके इस फैसले को निश्चय ही पलट देगी।
भाकपा ने उत्तर प्रदेश की राज्यपाल से अनुरोध किया कि वे योग और हठयोग की ऑथॉरिटी विद्वानों की पुस्तकों को पाठ्यक्रमों में शामिल करायें ताकि छात्रों का एकेडेमिक स्तर बड़े और वे सांप्रदायिक राजनीति के शिकार होने से बचाये जा सकें।
डा. गिरीश, राज्य सचिव
भाकपा, उत्तर प्रदेश।
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