*भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी कार्यालय सुभाष नगर गोंडा**ब्यूरो मंडल प्रभारी सुरेश कनौजिया खुशबू प्रमुख खुशबू कनौजिया गोंडा*
ब्यूरो मंडल प्रभारी सुरेश कनौजिया गोंडा
जिला मुख्यालय पर आम्बेडकर जी की जयंती बड़ें धूम धाम से मनाई गई जिसमें कामरेड सत्यनारायण त्रिपाठी, कामरेड सुरेश कुमार कनौजिया, कामरेड राधेश्याम कनौजिया, शिव कुमार कनौजिया , खुशबू कनौजिया, शिवम तिवारी, कयंकर तिवारी, अभमंयु तिवारी, कामरेड डा. रघुनाथ, कामरेड राम किशोर, बजरंगी कनौजिया, पवन कनौजिया
बहुत लोग ने माल अर्पण कर
श्रद्धांजलि दी। एवं भारत के संविधान के उद्देशिका पर शपथ ली।
भारत का संविधान
उद्देशिका
हम भारत के लोग भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को
सामाजिक आर्थिक और राजनीतिक न्याय विचार अभिव्यक्ति विश्वास धर्म और उपासना की स्वतंत्रता प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए
तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए
दृढ़ संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर 1949 ईस्वी (नीति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी संवत दो हजार छह विक्रमी) को एतद् द्वारा
इस संविधान को अंगीकृत अधिनियमित और आतमापिरत करते हैं
*बाबा साहेब का असली मिशन*
*भाग -2*
संविधान अच्छा है या खराबः-
“कोई वस्तु अच्छी है या खराब, यह इस बात से तय होती है कि उस वस्तु की तुलना किस वस्तु से की जा रही है.“ इस तथ्य की रोशनी में देखा जाए तो भारत का मौजूदा संविधान मनुस्मृति से अच्छा है. परंतु जब इस भारतीय संविधान की तुलना, बाबा साहब अंबेडकर के असली संविधान अर्थात "संयुक्त राज्य भारत का संविधान" अर्थात "राज्य और अल्पसंख्यक" नाम से लिखे गए राजकीय समाजवाद वाले संविधान से किया जाए, तो यह भारी-भरकम भारतीय संविधान, बाबा साहब अंबेडकर के राजकीय समाजवाद वाले संविधान के सामने जनविरोधी- जातिवादी- शोषकवर्ग का संविधान सिद्ध हो जायेगा.
शासक वर्ग चाह रहा है कि आप उसके संविधान की तुलना मनुस्मृति से करके "संतोषम् परम् सुखम्" की अनुभूति करते रहें
इसी को बाबा साहब का संविधान कहें और बाबा साहब के असली संविधान की चर्चा तक न करें.
●आरक्षण या सम्मान जनक नौकरियांः-
सरकारी नौकरियों में उच्च जातियों के पूरी तरह कब्जे के मुकाबले वंचितों को आरक्षण दिया जाना बहुत अच्छा है, मगर यह आरक्षण "उत्पादन के सभी संसाधनों के राष्ट्रीयकरण" से अच्छा नहीं है. अतः हमें न तो आरक्षण का आंख मूंद कर समर्थन करना चाहिए, और न ही आंख मूंद कर विरोध! हमारी आलोचना शोषित-पीडि़त वर्ग की बेहतरी के साथ-साथ, एक बेहतर समाज बनाने के लिए होनी चाहिए; जबकि RSS. के विचारों पर चलने वाले जातिवादी संगठनों के नेतागण, समाज में घृणा फैलाने के लिए आरक्षण व संविधान की आलोचना अथवा अंधसमर्थन करते हैं.
कुछ मूर्ख तो ऐसे हैं कि सारे सरकारी संस्थान बिक जाएं पर उन्हें आरक्षण चाहिए! यहां तक कि सारी नौकरियां अथवा सम्मानजनक सुरक्षित रोजगार खत्म हो जाएं पर उन्हें आरक्षण ही चाहिए!
इन अंधभक्तों ने आरक्षण रूपी साधन को ही साध्य समझ लिया है. सिर्फ 2 करोड़़ सरकारी नौकरियों में आरक्षण के भरोसे 110 करोड़ दलितों-पिछड़ों को खुशहाल बनाना चाह रहे हैं? कुछ तो निजीकरण का विरोध करने की बजाय, निजी क्षेत्रों में भी आरक्षण के लिए ताल ठोंक रहे हैं, इन्हें नहीं मालूम कि ईंटभट्ठों, निजी स्कूलों, प्राइवेट कारखानों आदि निजी क्षेत्रों में, दलित-पिछड़े मजदूर कहीं संख्या के अनुपात से ज्यादा भर्ती हैं और सस्ते में अपना श्रम बेचने को मजबूर हैं! अतः निजीकरण का समर्थन करने वाले ऐसे जातिवादी अंधभक्तों को अम्बेडकरवादी कहना डा. अम्बेडकर का अपमान है!
● जातिवादी नेताओं से हमारा एक सवालः-
RSS., कांग्रेस, भाजपा, शिवसेना, तृणमूल कांग्रेस, राजद, लोजपा, सपा, बसपा...लगभग सारी पूंजीवादी पार्टियों के नेतागण, और सारे जातिवादी संगठनों के चौधरी, चोरों-ठगों की तरह एक ही भाषा बोल रहे हैं कि- "संविधान बाबा साहब का है, और बाबा साहब ने ही संविधान में आरक्षण दिया." “भारत का संविधान, संविधान में आरक्षण, आरक्षण में जातिवाद, जातिवाद में भी दलितवाद का समर्थन ब्राह्मणों को गाली और कम्युनिज्म का विरोध“- इसी को जातिवादी अंधभक्तों ने अंबेडकरवाद की पहचान बना दिया है और बाबा साहब अंबेडकर के जो असली विचार हैं, उसे छिपा दिया गया है.
हमारा तो जातिवादियों से एक लाइन का सवाल है कि “अगर तुम दलितों के हितैषी हो तो तुम लोगों ने बाबा साहब के "राजकीय समाजवाद" वाले असली मिशन को छिपाया क्यों?“
क्या से क्या बना दिया अम्बेडकरवाद को :-
● बाबा साहब अंबेडकर का मिशन छिपाकर जातिवादियों ने अंबेडकर के नाम पर अपना जातिवादी मिशन चला दिया है बाबा साहब अंबेडकर का फोटो लगाकर जनता के ऊपर अपना गंदा विचार थोप रहे हैं, जिसका परिणाम यह निकल रहा है कि डॉक्टर अंबेडकर जहां एक ओर जाति विशेष के देवता बन कर रह गए हैं, वहीं दूसरी तरफ आरक्षण विरोधी -गरीब सवर्णों- के लिए घृणा के पात्र बन कर रह गए हैं.
प्राय: पिछड़ी जाति के लोग भी अंबेडकर को पसंद नहीं करते हैं, उन लोगों को ऐसा लगता है कि डॉ. अंबेडकर ले देकर सिर्फ दलितों का भला चाहते थे.
जातिवादियों ने अंबेडकर के नाम पर यही प्रचारित भी किया है, परन्तु सच्चाई इससे कहीं अलग है.
● सच्चाई क्या हैः-
सच्चाई यह है कि बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर अपने शुरुआती दौर में सिर्फ महारों के लिए महार परिषद बनाते हैं, मगर जब उनकी चेतना का स्तर और आगे बढ़ता है तब वे 1921 में "अछूत जाति संघ" बनाकर सारे अछूतों की बात करते हैं. साउथबरो कमीशन, साइमन कमीशन, गोलमेज सम्मेलन आदि में सफलतापूर्वक अछूतों की वकालत करते हैं, परंतु 1932 में पूनापैक्ट करके गांधी से हार जाते हैं! हारने के बाद भी सोचा कि हमारी आने वाली पीढि़याँ इस पूना पैक्ट को, जिससे दलाल और भड़वे पैदा होते हैं, पलट देंगी, मगर आने वाली पीढि़याँ, इस कदर दलाल और भड़वों की गिरफ्त में आ चुकी हैं, कि अब ये पीढि़याँ पूना पैक्ट की पूजा कर रही हैं!
पूना पैक्ट के बाद बाबा साहब डॉ. अंबेडकर, मार्क्सवाद से प्रभावित होकर 1936 में स्वतंत्र मजदूर दल बनाते हैं, जिसका झंडा लाल था. मगर आज तो अम्बेडकर के नाम से दुकानदारी चलाने वाले जातिवादी नेता, लाल रंग से घृणा करते हैं.
बाबा साहब ने मार्क्स-एंगेल्स रचित कम्यूनिस्ट घोषणापत्र पढ़ने की सलाह दी मगर जातिवादियों ने इसकी चर्चा तक नहीं किया!
सन् 1946 तक डॉक्टर अंबेडकर आरक्षण का किसी न किसी रूप में वकालत करते रहे, मगर 15 मार्च 1946 आते-आते वे "सबके लिए सम्मानजनक सुरक्षित रोजगार की गारंटी" की राजनीति की ओर बढ़ने लगे. इसके लिए वे "उत्पादन के सभी संसाधनों का राष्ट्रीयकरण" चाहते थे. "शोषण से संरक्षण" के लिए यही उनका मिशन था.
यही वह अम्बेडकरवाद है, जिसे जातिवादियों ने छिपाया है!
वे जानते थे कि नेहरू की पूंजीवादी नीतियों पर बने संविधान से, सबको सम्मानजनक व सुरक्षित रोजगार नहीं मिल सकता. इसीलिए उन्हें "राज्य और अल्पसंख्यक" नाम का अपना संविधान लिखना पड़ा.
जब वे 1946 में जसपुर खुलना सीट से "मुस्लिम लीग" के सहयोग से जीत कर संविधान सभा में पहुंचे थे, उस वक्त नेहरू द्वारा प्रस्तावित संविधान की उद्देशिका पर बहस चल रही थी, तो बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर ने पं. जवाहरलाल नेहरू द्वारा प्रस्तुत सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय देने की जुमलेबाजी की धज्जियां उड़ा दिया था. उनकी बात पर नेहरू की बोलती बंद हो गई थी. उस वक्त नेहरू के पास कोई जवाब नहीं था.
जब 17 दिसंबर 1946 को संविधान सभा में उद्देशिका पर बहस करते हुए बाबा साहब ने पूछा था-
“प्रस्ताव में सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय की व्यवस्था की गई है..यदि प्रस्ताव में कोई वास्तविकता है, इसमें कोई सच्चाई है और इसकी सच्चाई पर मुझे जरा भी शक नहीं है क्योंकि उसे उपस्थित किया है माननीय पंडित जवाहरलाल नेहरू ने. मैं उम्मीद करता हूं कि इसमें कुछ ऐसी व्यवस्था भी होनी चाहिए थी जिससे राज्य के लिए यह संभव हो जाता कि वह सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक न्याय प्रदान कर सकता और इसी विचार से मैं इस बात की आशा करता कि प्रस्ताव साफ-साफ शब्दों में कहता कि "देश में उद्योग धंधों और जमीनों का राष्ट्रीयकरण किया जाएगा ताकि सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय प्रदान किया जा सके." मेरी समझ में नहीं आता कि जब तक देश की अर्थनीति समाजवादी नहीं होगी तो किसी भी भावी हुकूमत के लिए कैसे संभव होगा कि वह सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्रदान कर सकेगा? अतः यद्यपि व्यक्तिगत रूप से इन सिद्धांतों के सन्निहित किए जाने पर कोई आपत्ति नहीं है, फिर भी प्रस्ताव मेरे लिए निराशाप्रद ही है."
(संविधान सभा के वाद-विवाद पुस्तक-1 पेज संख्या- 15-16)
बिना समाजवाद लागू किये सामाजिक आर्थिक राजनीतिक न्याय को आप यूं समझ सकते हैं- जैसे भूख से पीडि़त कोई भूमिहीन किसान, किसी जमींदार के खेत से गन्ना तोड़ लेता है. जमींदार उसके खिलाफ FIR. करता है. उस गरीब किसान को पुलिस पकड़ लेती है, उसे जेल में डालती है, मुकदमा चलता है और जब वह न्यायालय में जज के सामने पेश होता है, तो भूमिहीन किसान बहुत तर्क देता है कि “हुजूर, हमने ही खेत की जुताई किया, हमने ही गन्ने की बुवाई किया, हमने ही उसकी गुड़ाई किया, हमने ही सिंचाई किया हमने ही खाद डाला, इसके बाद एक ही गन्ना तो तोड़ा था!“
मगर जज उसकी एक भी बात नहीं सुनता, सजा सुना देता है. वह जज उस जमींदार से यह नहीं पूछता कि “तुम्हारे पास हजारों एकड़ जमीन क्यों इकट्ठा हो गई है कि तुम्हारे गांव के हजारों लोगों को भूमिहीन रहना पड़ता है और उन्हें भूख मिटाने के लिए तुम्हारे खेत में चोरी से गन्ना तोड़ना पड़ता है, इसलिए असली अपराधी तो तुम्हीं हो! लिहाजा तुम्हारी सारी जमीन भूमिहीन और गरीब किसानों में बांटने का हुकुम दिया जाता है."
यदि वह ऐसा न्याय करेगा तो जज की कुर्सी से उसे हटा दिया जाएगा. जज कानून के हिसाब से निर्णय करता है, नैतिकता के हिसाब से न्याय नहीं. वह यह नहीं देखता कि नैतिकता क्या कहती है. वह यह देखता है कि कानून क्या कहता है. वह सीधे चोरी के जुर्म में उसे सजा सुना देता है. समाजवाद के बिना ऐसे ही होगा- सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय!
इसीलिये बाबासाहेब डा. अम्बेडकर ने नेहरू की चालबाजी (?) से भरी उद्देश्यिका का विरोध किया था, और लिख डाला--
“राज्य और अल्पसंखयक“ नाम से असली संविधान; जिसमें राजकीय समाजवाद की व्यवस्था को शामिल किया और इसे 15 मार्च 1947 को एक ज्ञापन के तौर पर संविधान सभा को सौंपा था. यही उनका असली संविधान था!!
इसकी प्रस्तावना में देख सकते हैं कि इसमें “सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक विषमता" दूर करने का संकल्प लिखा गया है. इस संकल्प को पूरा करने के लिए इस असली संविधान में सारी जमीनों, कल-कारखानों, खान-खदानों, यातायात के संसाधनों, बैंकों आदि का राष्ट्रीयकरण करने का प्रावधान किया था. इसे बाबासाहब ने राजकीय समाजवाद कहा था, जबकि जातिवादियों के संविधान में, जनता को आर्थिक शोषण से बचाने के लिये कोई प्रावधान नहीं है. जातिवादियों के मौजूदा संविधान में सिर्फ सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय की बात कही गयी है. वह भी बिना समाजवाद के.
इस जुमलेबाजी की डा. अम्बेडकर ने बखिया उधेड़ दिया था.
इस पर नाराज होकर सरदार वल्लभ भाई पटेल ने कहा था कि-
“हम अम्बेडकर को संविधान सभा में घुसने नहीं देंगे. उनके लिए हमने संविधान सभा के खिड़की, दरवाजे और यहां तक कि रोशनदान भी बंद कर दिया है."
इसके बाद सन 1947 में देश का विभाजन करके जसपुर खुलना जो डॉ. अंबेडकर का चुनाव क्षेत्र था, उस क्षेत्र को पाकिस्तान को दे दिया. इस प्रकार डा. अंबेडकर को संविधान सभा से बाहर कर दिया गया.
परंतु राजकीय समाजवाद का क्या हुआ?ः-
आगे चलकर कैबिनेट मिशन के दबाव में कांग्रेसियों ने अपनी एक सीट खाली करके बाबा साहब अंबेडकर को चुनाव जिता कर संविधान सभा में शामिल करवाया. नेहरू ने डॉक्टर अंबेडकर को तो संविधान सभा में शामिल कर लिया मगर उनके राजकीय समाजवाद सम्बन्धी प्रस्ताव को बहस के लिए संविधान सभा में शामिल नहीं किया. अतः डॉक्टर अंबेडकर संविधान सभा में शामिल हो गए मगर उनके विचारों को कूड़ेदान में डाल दिया गया. चालाक नेहरू द्वारा डा. अम्बेडकर समेत संविधान सभा के सारे असंतुष्ट सदस्यों को यह कहकर मना लिया गया कि “यह संविधान सिर्फ पांच साल के संक्रमण काल के लिए है."
एम. अनन्तशयनं आयंगर ने 9 नवम्बर 1948 को संविधान सभा में कहा था-
“कल हमारे नेता, हमारे प्रधानमंत्री महोदय ने यह कहा था कि इस विधान को 5 वर्ष तक अस्थायी रूप से स्वीकार किया जाये, ताकि इस काल में हमें जो कुछ भी अनुभव हो, उसके आधार पर भविष्य में प्रौढ़ मताधिकारियों द्वारा निर्वाचित एक परिषद उसमें संशोधन या परिवर्तन कर सके."
(संविधान सभा के वाद-विवाद पुस्तक संख्या-3 पेज संख्या- 371)
● क्या आरक्षण का प्रस्ताव नेहरू ने दिया :-
जातिवादियों ने अधिकांश लोगों के मन में यह भ्रम बना दिया है कि मौजूदा संविधान में बाबा साहब ने ही आरक्षण का प्रस्ताव रखा था. आरक्षण को ही बाबा साहब का मिशन समझने वाले लोग यह सच्चाई जान लें कि जब अल्पसंख्यकों, दलितों, आदिवासियों को आरक्षण देने के सवाल पर बाबा साहब डॉ. अंबेडकर से संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने कहा कि ..."फिर आरक्षण दिया गया तो कई पाकिस्तान बनेंगे, अतः इस प्रस्ताव को वापस लिया जाये, बल्कि जमीन, कारखाना आदि में जिसका जितना हिस्सा बनता है दे दिया जाए." तब बाबा साहब अंबेडकर ने कहा था कि
“यह आरक्षण का प्रस्ताव हमारा नहीं है.“
इस संबंध में 4 नवम्बर 1948 को संविधान सभा में बाबा साहब डॉक्टर अंबेडकर अपने भाषण में कहते हैं कि-
“संविधान के मसौदे की इसलिए भी आलोचना की गई है कि इसमें अल्पसंख्यकों के संरक्षण की व्यवस्थाएं रखी गई हैं, परन्तु इसके लिए मसौदा समिति जिम्मेदार नहीं है इसे तो विधान परिषद के अनुसार चलना था. जहां तक मेरे निजी मत की बात है, मैं कह सकता हूं कि विधान परिषद ने अल्पसंख्यकों के हितों के संरक्षण की व्यवस्था करके अवश्य ही बुद्धिमानी का काम किया है."
(संविधान सभा के वाद-विवाद पुस्तक संख्या 3 पेज संख्या 77 )
उपरोक्त तथ्य के अलावा एक और तथ्य है जिससे आप को समझ में आ जायेगा कि आरक्षण प्रस्ताव बाबा साहब अम्बेडकर का है या नेहरू का है, आप संविधान में दिए गये नेहरू के प्रस्ताव के बिन्दु 5 को भी देख सकते हैं-
“5- जिसमें सभी अल्पसंख्यकों के लिए, पिछड़े हुए कबायली प्रदेशों के लिए तथा दलित और पिछड़ी हुई जातियों के लिए काफी संरक्षण-विधि रहेगी;“
(संविधान सभा के वाद-विवाद पुस्तक संख्या-1 लक्ष्य संबंधी प्रस्ताव पेज-5)
तो फिर अम्बेडकर को क्यूं बदनाम करते हैंः-
उपरोक्त तथ्यों से यह बात सिद्ध हो जाती है कि आरक्षण का प्रस्ताव नेहरू ने ही संविधान सभा के समक्ष रखा था. यह आरक्षण का प्रस्ताव नेहरू के उस 9सूत्रीय प्रस्ताव का एक हिस्सा है, जिसकी परिधि में संविधान का निर्माण किया जाना था, परंतु डॉक्टर अंबेडकर के राजकीय समाजवाद के मिशन को छिपाकर इसी आरक्षण को ही अंबेडकर का मिशन बता दिया गया.
शोषक वर्ग के लोग खासतौर से नेहरू ने यह प्रचार करवाया कि आरक्षण का प्रस्ताव डॉक्टर अंबेडकर का प्रस्ताव है. अगर नेहरू ने उसी समय कह दिया होता कि संविधान सभा में दलितों को आरक्षण देने का प्रस्ताव मैंने (नेहरू ने) ही दिया था तो दलित वर्ग नेहरू से जरूर खुश हो जाता मगर उस वक्त यह दलित वर्ग इतना कमजोर था कि नेहरू को 1952 के चुनाव में जिताने की हैसियत में नहीं था. अगर जनता के बीच इसका खुलासा हो गया होता कि नेहरू ने ही आरक्षण का प्रस्ताव संविधान सभा में रखा था, तो उस वक्त सवर्ण वर्गों का इतना प्रभाव था कि 1952 के ही चुनाव में शायद नेहरू को हरा देते! ठीक वैसे ही जैसे मंडल कमीशन लागू करने वाले वी. पी. सिंह की सरकार को ढहा दिया और उन्हें दोबारा चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बनने नहीं दिया.
अगर नेहरू यह कहते कि मैंने आरक्षण दिया तो उनकी भी हालत बी. पी. सिंह जैसी हो सकती थी.
तब आज जो लोग अंबेडकर की मूर्तियों को तोड़ रहे हैं वे लोग नेहरू की मूर्तियां तोड़ रहे होते!
बात इतनी ही नहीं है, नेहरू ने आरक्षण के प्रस्ताव को अंबेडकर का प्रस्ताव बता कर, एक तीर से दो शिकार किया- पहला यह कि खुद को सवर्णों के ताप से बचा लिया और अंबेडकर को सवर्णों का कोप भाजन बना दिया!
इसी कारण अक्सर सवर्ण लोग ही अंबेडकर की मूर्तियां तोड़ते रहे हैं.
दूसरा यह कि इस आरक्षण को ही बाबा साहब का मिशन बताकर, उनके "राजकीय समाजवाद" वाले असली मिशन को छिपा दिया.
इस प्रकार पूंजीपतियों को भी बेरोजगार नौजवानों के ताप से बचा लिया!
इस प्रकार मौजूदा व्यवस्था में 15 बनाम 85 अर्थात सवर्ण बनाम दलित के बीच जातीय संघर्ष की बुनियाद नेहरू ने ही रख दिया था जिसे आज RSS. जैसे दक्षिणपंथी संगठनों के सहयोग से, जातिवादी नेता और उनकी पार्टियां आगे बढ़ा रही हैं.
इस प्रकार 15 बनाम 85 के बीच नफरत की बुनियाद नेहरू ने ही रखा था, जिसे जातिवादी नेताओं ने अम्बेडकर का मिशन कहकर आगे बढ़ाया और आज भी बढ़ा रहे हैं.
आरक्षण का प्रस्ताव नेहरू का था. यह रहस्य RSS. ने भी जनता को नहीं बताया, बल्कि इस बात का प्रचार किया कि डॉ. अंबेडकर के प्रयास से ही संविधान में आरक्षण मिल पाया, जबकि यह नेहरू की चाल थी.
अम्बेडकर पूनापैक्ट के विरुद्ध कम्यूनल एवार्ड चाहते थे. आरक्षण तो नेहरू की मजबूरी थी.
नेहरू की मजबूरी क्या थीः-
इस सच्चाई को जान कर लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा होगा कि नेहरू की क्या मजबूरी थी कि वह आरक्षण का प्रस्ताव पास कराते?सही मायने में यह प्रस्ताव व्यक्तिगत रूप से नेहरू का नहीं था. यह बड़े सामन्तों (राजे-रजवाड़ों,नवाबों), बड़े पूंजीपतियों का प्रस्ताव था जिनका प्रतिनिधित्व नेहरू कर रहे थे. नेहरू माडल आरक्षण के निम्न कारण थे-
1-राजे-रजवाड़े-नवाब, बड़े पूंजीपति सब के सब रूस और चीन जैसी क्रांति से डरे हुए थे.
नेहरू और गांधी जैसे लोग यह जानते थे कि भारत में किसी भी क्रांति को रोकने के लिए सवर्णों और दलितों को आपस में लड़ाना जरूरी है. नेहरू और RSS. के मिशन को आज भी अंबेडकर का मिशन कहकर, अंबेडकर को बदनाम किया जा रहा है. यह सारी कवायद सिर्फ इसलिए कि "राजकीय समाजवाद या वैज्ञानिक समाजवाद" लागू करने के लिए जनता कहीं क्रान्ति न कर बैठे.
2- कार्ल मार्क्स ने कहा है-
“शोषकवर्ग की राजसत्ता उतनी ही मजबूत और टिकाऊ होती है जितनी कि वो शोषित उत्पीडि़त वर्गों के आगे बढ़े हुए तबके को आत्मसात करने में सक्षम होता है."
इस कथन की रोशनी में देखें तो समझेंगे कि आरक्षण के जरिए दलितों पिछड़ों का आगे बढ़ा हुआ तेज-तर्रार तबका, जो अपने वर्ग के गरीबों का मार्गदर्शन कर सकता था, वह शोषक वर्ग के पाले में चला जाता है और अपनी ही जाति के गरीबों के साथ धोखाधड़ी करता है.
शायद इसीलिए डॉक्टर अंबेडकर ने 1956 में आगरा कॉन्फ्रेंस में रोते हुए कहा था-
“मुझे मेरे ही समाज के पढ़े लिखे लोगों ने धोखा दिया."
अतः इस मामले में कार्ल मार्क्स और अंबेडकर दोनों का अनुभव प्रकारान्तर से एक जैसा रहा है.
एक दृष्टांतः-
आरक्षण नीति के पीछे शोषक वर्ग की इस साजिश को समझने के लिए हम आप को एक दृष्टान्त दे रहे हैं- आप जानते होंगे सड़कों के किनारे बड़े-बड़े बैनर जो लगाए जाते हैं, उस बैनर में जगह-जगह होल बने होते हैं। भोले-भाले लोग सोचते हैं कि किसी शरारती तत्व ने बैनर को नुकसान पहुंचाने के लिए पत्थर मारकर छेद कर दिया होगा. परन्तु सच्चाई यह है कि बैनर का मालिक ही बैनर में छेद करवाता है ताकि आंधी-तूफान आए, तो हवा पास हो जाए और बैनर उखड़ने से बच जाए. इसी तरह पूंजीपति वर्ग ने अपनी व्यवस्था में आरक्षण रूपी छेद कर दिया है, ताकि जनता की कोई आंधी उसकी पूंजीवादी व्यवस्था को उखाड़ ना सके और शोषित उत्पीडि़त वर्ग की कुछ प्रतिभाएं उस आरक्षण रूपी छेद से पास होकर शोषक वर्ग के पक्ष में चली जायें.
हालांकि बाबा साहब अंबेडकर "पूना पैक्ट मॉडल आरक्षण" के प्रबल विरोधी थे फिर भी नेहरू के प्रस्ताव का विरोध नहीं किया क्योंकि वे जानते थे कि इससे कम से कम कुछ दलितों का भला हो जाएगा! आज भी उनके आरक्षण का समर्थन इन्हीं अर्थों में किया जाना चाहिए.
परंतु जातिवादी लोग आरक्षण को ही बाबा साहब अंबेडकर का मिशन बताकर, जनता को गुमराह कर रहे हैं, जबकि बाबा साहब डॉ. अंबेडकर का मिशन "राजकीय समाजवाद था."
भारतीय संविधान लायक जनता नालायक?ः-
आज बाबा साहब का अनुयायी बनने का ढोंग करने वाले जातिवादी नेता दावा करते हैं कि मौजूदा भारतीय संविधान में ही बाबा साहब ने हमारे सभी आर्थिक अधिकारों को लिख दिया है, अब हमें सिर्फ उस लायक बनकर उसे हासिल करना बाकी है.
इन जातिवादियों के कहने का मतलब संविधान में सारी लायकियत है तथा गरीब जनता और उसके नौजवान बच्चे, जो कि प्रतियोगिता में थोड़ा पिछड़ जा रहे हैं, वे नालायक हैं.
हमारा कहना है:
अगर तुम्हारा संविधान बहुत लायक है और हमारे बेरोजगार बच्चे गधे हैं तो तुम इन्हें गधों वाली ही नौकरी दे दो.
भारतीय संविधान में अम्बेडकर का मिशन नहींः-अंबेडकर के राजकीय समाजवाद वाले मिशन को छिपाकर जातिवादियों ने यह प्रचार किया कि “भारतीय संविधान ही अंबेडकर का मिशन है."
वे भोले-भाले लोगों को समझाते हैं कि “संविधान में ही बाबा साहब ने सारे अधिकार लिख रखे हैं." जबकि डॉ.अम्बेडकर खुद कह रहे हैं कि “इस संविधान मे तुम्हारी सामाजिक और आर्थिक समस्याओं का कोई समाधान नहीं बताया गया है."
इस पूंजीवादी लोकतंत्र में यदि समाजवादी व्यवस्था कर दी जाती तो पूंजीवादी लोकतंत्र का विनाश ही हो जाता. इस बात को बाबा साहब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने महसूस किया था.
आप देखिये जब 15 नवंबर सन 1948 को जब प्रोफ़ेसर के.टी. शाह ने संविधान की उद्देशिका में समाजवादी शब्द जोड़ने के लिए प्रस्ताव रखा था, तब बाबा साहब अंबेडकर ने कहा था-
“जैसा कि मैंने सभा के सम्मुख प्रस्तुत प्रस्ताव के समर्थन में आरंभिक भाषण में कहा था, यह विधान, राज्य के विभिन्न अंगों को संचालित करने के लिए एक यंत्र स्वरूप है. राज्य की नीति क्या हो या समाज का आर्थिक तथा सामाजिक संगठन किस प्रकार का हो? यह ऐसे प्रश्न हैं कि इनको विधान में स्थान नहीं दिया जा सकता. इन्हें देश और काल देखकर जनता ही हल कर सकती है, क्योंकि इनको विधान में शामिल करने का अर्थ होगा इस लोकतंत्र का विनाश. आगे चलकर लोग अपने लिए स्वयं ही निश्चित करेंगे कि वे किस प्रकार का सामाजिक संगठन चाहते हैं."
(संविधान सभा के वाद-विवाद पुस्तक संख्या 3 पेज संख्या 462-463)
● संविधान सभा में 25 नवंबर सन 1949 को संविधान सौंपते समय बाबा साहब अंबेडकर ने कहा था-
“26 जनवरी 1950 को हम विरोधी भावनाओं से परिपूर्ण जीवन में प्रवेश कर रहे हैं, जहां राजनीतिक जीवन में समता का व्यवहार करेंगे वहीं सामाजिक आर्थिक जीवन में असमता का. एक ओर राजनीति में एक व्यक्ति के लिए एक मत और एकमत का एक ही मूल्य के सिद्धांत को मानेंगे, दूसरी ओर अपने सामाजिक और आर्थिक जीवन में अपनी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था के द्वारा एक व्यक्ति का एक ही मूल्य के सिद्धांत का खंडन करते रहेंगे. इन विरोधी भावनाओं से जीवन को हम कब तक बिताते चले जाएंगे? इसका बहुत काल तक खंडन करते रहेंगे तो हम अपने राजनीतिक लोकतंत्र को संकट में डाल देंगे. हमें इस विरोध को यथासंभव शीघ्र ही मिटा देना चाहिए अन्यथा जो असमानता से पीडि़त हैं, इस राजनैतिक लोकतंत्र की उस रचना का विध्वंस कर देंगे जिसका निर्माण इस सभा ने इतने परिश्रम के साथ किया है."
(संविधान सभा का वाद-विवाद, पुस्तक संख्या-8, पेज संख्या- 4227)
इस प्रकार देख सकते हैं कि डॉ. अम्बेडकर खुद कह रहे हैं कि "इस संविधान के जरिए हम सिर्फ राजनीतिक रूप से समान होंगे, वह भी सिर्फ इतना कि सबके वोट का मूल्य बराबर हो गया है."
बाबा साहब ने यह भी कहा था कि “अगर इस आर्थिक और सामाजिक असमानता को जल्द दूर नहीं किया गया तो असमानता से पीडि़त लोग इस लोकतंत्र की धज्जियां उड़ा देंगे."
परंतु इन जातिवादियों ने गरीब जनता को झूठी पढ़ाई पढ़ा कर, इतना गुमराह कर दिया है कि आज जब कि हमारे देश में ऊपर के सिर्फ 9 लोगों के पास इतनी सम्पत्ति इकट्ठा हो गयी है, जितना कि नीचे के 70 करोड़ लोगों के पास नहीं है; मंहगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार चरम पर है; तो भी यह दलित गरीब जनता, इस पूंजीवादी लोकतंत्र और उसके संविधान को बचाने के लिए खून की नदियां बहाने को तैयार है!
स्थिति यह है कि आज जातिवादियों ने जनता में फूट डालकर जनता के एक बड़े तबके को इतना निर्बल, निरीह, हताश, निराश, लाचार, कायर, दिग्भ्रमित, नपुंसक, मुफ्तखोर और कमजोर बना दिया है कि आज अगर सरकार की गलत नीतियों के कारण कई करोड़ लोग, भूख से मर जाएं तो भी लोग क्रांति के लिए तैयार नहीं होंगे और ना ही वे शोषक वर्ग का बाल बांका कर पाएंगे. जातिवाद करके आपस में लड़ने वाली जनता, कितनी भी बहादुर क्यों न हो, शोषक वर्ग का एक रोवां भी टेढ़ा नहीं कर सकती.
क्या बिना समाजवाद के सिर्फ नीयत से अधिकार मिलेगा?ः- जो जातिवादी लोग भारतीय संविधान को ही बाबासाहेब अम्बेडकर का मिशन बताते हैं और संविधान के खिलाफ बोलने पर खून की नदियां बहा देने की धमकियां देते हैं, वे अक्सर यह उदाहरण देते हैं कि बाबा साहब ने कहा था कि "संविधान चाहे जितना भी अच्छा हो यदि उसे लागू करने वाले लोग बुरे हैं तो वह निसंदेह बुरा हो जाता है. संविधान का क्रियान्वयन पूर्णतया संविधान पर निर्भर नहीं करता है."
इसी आधार पर जातिवादियों का कहना है कि सत्ता में बैठे बड़ी जातियों के नेताओं की नीयत ठीक नहीं है, इसीलिए वे लोग इस संविधान को सही ढंग से लागू नहीं कर रहे हैं. वे यह भी मानते हैं कि छोटी जाति के नेताओं की नीयत ठीक होती है, अतः उनको सरकार बनाने का मौका मिले तो दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों के सामाजिक,आर्थिक, राजनीतिक सारे अधिकार मिल जाएंगे. इसको भी वे बाबा साहब का मिशन बताते हैं, जबकि सन् 1946 में ही बाबा साहब अम्बेडकर ने कह दिया था कि-
सारी जमीनों, उद्योगों, बैंकों आदि का राष्ट्रीयकरण किए बगैर सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय नहीं मिल सकता!
इन जातिवादियों से पूछिये कि तुम जमीनों, उद्योगों, बैंकों आदि का सामाजीकरण किए बिना कैसे सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय दे दोगे ? और सत्ता पाने के बाद कि तुम दलाल नहीं बनोगे, इसकी क्या गारण्टी है? आज तुम ईमानदार हो तो कल भी ईमानदार रहोगे इसकी क्या गारण्टी है?
जातिवादियों के पास इसकी कोई गारण्टी नहीं है. इसकी गारण्टी तो सिर्फ समाजवाद में है.
बाबासाहेब कहते हैं कि-
सिर्फ समाजवाद से ही सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय मिल सकता है.
जरा सोचिए, क्या यह अम्बेडकर का मिशन हो सकता हैः- जातिवादी नेता जिस भारतीय संविधान को अम्बेडकर का मिशन बता रहे हैं, नीचे हम उसकी कुछ झलकियां दे रहे हैं. जरा देख कर बताइए कि क्या यही बाबा साहब का मिशन था-
(1) अनुच्छेद-19- 1(क) बोलने की आजादी देता है जबकि 1951 में पहला संविधान संशोधन करके अनुच्छेद19- 1(ख)- जोड़कर आन्तरिक सुरक्षा को खतरा के नाम पर अभिव्यक्ति की आजादी छीन ली गयी.
(2)अनु. 25- बौद्ध, जैन, सिख, लिंगायत आदि को हिन्दू धर्म का अंग मानता है..जब कि अम्बेडकर इसके विरुद्ध थे.
(3)अनु. 290(।) केरल राज्य प्रतिवर्ष 46 लाख 50 हजार तथा तमिलनाडु राज्य 13 लाख 50 हजार प्रतिवर्ष हिन्दू मंदिरों के लिए देवस्थानम् निधि को देने के लिये बाध्य है, जब कि अनु. 36 से 51 तक लिखे नीति निर्देशक तत्वों में निहित जनपक्षधर प्रावधानों को लागू करने के लिये सरकारों को बाध्य नहीं किया गया..सरकार चाहे तो करे, चाहे तो न करें.
(4)अनु. 363 भारत में ब्रिटिश साम्राज्य के हितों का संरक्षण करता है.
(5)अनु. 14 में सिर्फ विधि के समक्ष समता की बात की गयी है. पूरे संविधान में आर्थिक समानता के लिए कोई प्रावधान नहीं है.
(6)पूरे संविधान में कहीं भी सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक स्वतंत्रता का कोई जिक्र तक नहीं है. इसके बिना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता 99% जनता के लिए निरर्थक है. उद्देश्यिका में भी फ्रीडम नहीं लिबर्टी शब्द है, वह भी सिर्फ पूजापाठ की, जबकि हमारे लोगों को सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक क्षेत्र में फ्रीडम यानी स्वतंत्रता जरूरी थी.
(7)अनु. 372- जाति एवं वर्ण व्यवस्था को बनाए रखने को मजबूर करता है.
अम्बेडकर ने संविधान जलाने की बात कियाः-
यह बात सही है कि डा. अंबेडकर ने 25 नवंबर 1949 को संविधान सौंपते समय कहा था-
“संविधान चाहे जितना भी अच्छा हो यदि उसे लागू करने वाले लोग बुरे हैं तो वह निसंदेह बुरा हो जाता है."
परंतु जातिवादी नेता लोग हमको यह नहीं बताते कि आगे चलकर तीन-चार वर्षों में जब बाबा साहब अंबेडकर ने संविधान के क्रियाकलापों और उसके प्रभाव को अच्छी तरह समझ लिया था, तो 2 सितंबर 1953 को राज्यसभा में आंध्र प्रदेश बिल पर बहस करते हुए कहा था कि-
“Sir, my friends say that I made the Constitution- But I am quite ready to say that I will be first to burn it.“
(महोदय, मेरे मित्र बताते हैं कि संविधान मैंने बनाया। लेकिन मैं यह कहने के लिए काफी तैयार हूं कि मैं इसे जलाने वाला पहला व्यक्ति बनूंगा)
सिर्फ 3-4 वर्षों में ही बाबा साहब अम्बेडकर समझ गये थे कि यह संविधान सिर्फ मुट्ठी भर लोगों के पक्ष में तथा बहुसंख्यक जनता के खिलाफ है. सत्ता की मलाई चाटने वाले जातिवादी नेताओं के बहकावे में आकर अधिकांश दलित बुद्धिजीवी आज भी इसे अपना संविधान समझते हैं, जबकि 2 सितम्बर 1953 को बाबा साहब खुद कहते हैं-
“I was a hack“ (मैं भाड़े का लेखक था)
जो बात बाबा साहब सिर्फ 3-4 वर्षों में ही समझ गये, उसे दलित बुद्धिजीवी 70-75 साल में भी नहीं समझ पाए!
■ और पेरियार ने भारतीय संविधान जला दियाः-
बाबा साहब अम्बेडकर को भले ही मौका न मिला हो, परन्तु उनके मरने के बाद उनके मित्र पेरियार ई.वी. रामास्वामी नायकर ने अनु. 372 के सवाल पर 25 नवंबर 1957 को अपने 10 हजार समर्थकों के साथ, खुलेआम सभा करके भारतीय संविधान को जला दिया था! तब नेहरू ने अपने संविधान की रक्षा के हित में पेरियार को, उनके 3 हजार समर्थकों के साथ, गिरफ्तार कर जेल भेजा था. उन लोगों को 6 महीने से लेकर 3 साल तक की कठोर कारावास की सजा मिली थी. इनमें औरत, बूढ़े तथा बच्चे भी थे. उनमें से 16 लोग जेल के भीतर ही मर गए थे.
कक्षा 5 पास पेरियार ने भारतीय संविधान के मूल रहस्य को समझ लिया था, मगर आज हजारों IAS, PCD और लाखों बुद्धिजीवी बी.ए., एम.ए., एल.एल.बी., पी.एच.डी. जैसी डिग्रियां हासिल करने के बाद भी, यह नहीं समझ पा रहे हैं कि यह बाबा साहब की मर्जी का संविधान नहीं है तथा यह संविधान शोषक वर्ग के हितों की रक्षा के लिए है ना कि गरीबों की झोपड़ियों की रक्षा के लिए. और यह भी नहीं समझ पा रहे हैं कि इस तरह का संविधान, इसलिए लाया गया कि आज के विज्ञान के युग में जनता को मनुस्मृति से हांका जाना संभव नहीं है!
● अगर बाबा साहब का असली मिशन लागू हुआ होताः-
वास्तव में दबे कुचले वर्गों के हित के लिए बाबा साहब डॉ. अंबेडकर ने समाजवाद का लक्ष्य दिया. इसी मिशन पर काम करने के लिए शोषित पीडि़त वर्गों को एक रास्ता दिया था.
अगर बाबा साहब का राजकीय समाजवाद वाला संविधान लागू हो गया होता तो ना कोई आपका अधिकार छीनने वाले बड़े-बड़े सामंत होते और ना बड़े-बड़े दैत्याकार पूंजीपति. इतना ही नहीं, यदि बाबा साहब का असली संविधान लागू करके सारी जमीन, कल-कारखाने, खान-खदान, यातायात के संसाधन, स्कूल, अस्पताल सब सरकारी बना दिया गया होता तो अब तक सबकी गरीबी दूर हो गयी होती.
1-नेहरू के मौजूदा संविधान लागू होने से सिर्फ 2% अछूतों को नौकरी मिल पाई है, जबकि असली संविधान लागू हुआ होता तो कम से कम 60-70% अछूतों को अब तक सरकारी नौकरियां मिल गई होतीं और लगभग इसी अनुपात में दूसरे वर्गों को भी. बाकी लोग छोटे व निजी उद्यमों में रोजगार पा जाते, कोई बेरोजगार नहीं होता.
2- नेहरू के संविधान के लागू होने से आज भी 90% दलितों की स्थिति दयनीय बनी हुई है..वे आज भी भूमिहीन व गरीब किसान बने हुए हैं, मगर बाबा साहब का असली संविधान लागू हुआ होता तो एक भी भूमिहीन व गरीब किसान नहीं होता. सभी जाति धर्म के किसानों के पास जमीन होती और उन्हें अपनी उपज का लाभकारी मूल्य मिलता सभी खुशहाल होते.
3- नेहरू के संविधान के कारण 1% लोगों के पास लगभग 80% प्रतिशत से ज्यादा संपत्ति ईकट्ठा हो चुकी है. ऊपर के सिर्फ 9 पूंजीपतियों के पास इतनी संपत्ति इकट्ठा हो चुकी है कि जितना नीचे के 70 करोड़ लोगों के पास भी नहीं है, जबकि बाबा साहब का असली संविधान लागू हुआ होता तो अमीरी गरीबी का इतना भयानक अंतर नहीं होता.
4-नेहरू के संविधान के तहत मौजूदा सरकार सारे सरकारी कल-कारखानों, रेलों, बसों, सड़कों, स्कूलों अस्पतालों, बैंकों, खान-खदानों को मिट्टी के भाव पूंजीपतियों के हाथ बेचती जा रही है. बाबा साहब का असली संविधान लागू होता तो सरकार एक भी सरकारी संस्थान नहीं बेच पाती तथा बेचने की कोशिश करने वाले मोदी, मायावती, मनमोहन... जैसे लोग जेल की सलाखों के पीछे होते.
5- नेहरू के संविधान के रहते शोषण, दमन, उत्पीड़न, भय, आतंक, अराजकता, अंधराष्ट्रवाद, अंधभक्ति, व्यक्तिपूजा, हिटलरशाही में बढ़ोत्तरी होती जा रही है. अगर बाबा साहब का असली संविधान होता तो समाज की ऐसी दुर्दशा नहीं होती.
6-आज भारत के 80% बाजार पर चीन के सस्ते सामानों का दबदबा कायम हो गया है, हमारे देश के बाजार में हमारे देश के कल-कारखानों का माल नहीं बिक पा रहा है, जिसके कारण हमारे देश के कल-कारखाने बंद होते जा रहे हैं और भयानक रूप से बेरोजगारी बढ़ती जा रही है. मगर नेहरू के भारी भरकम संविधान में इस समस्या का कोई समाधान नहीं है. जरा जातिवादियों से पूछिए कि इसका क्या समाधान है? तो उनकी बोलती बन्द हो जाएगी.
वास्तव में अगर बाबा साहब का संविधान लागू होता तो हम समाजवाद की ओर बढ़ रहे होते तब हम करीब-करीब चीन की बराबरी कर लेते तब चीन से दुश्मनी की बजाय दोस्ती होती और सीमा पर सुरक्षा को लेकर इतना भारी भरकम खर्च भी ना होता.
7- अगर बाबा साहब का असली संविधान लागू होता तो आज हमारे देश में एक भी आसाराम बापू एक भी राम रहीम और एक भी कुलदीप सेंगर जैसे लोग नहीं होते तथा एक भी राजा बड़हल सिंह, राजा कटहल सिंह, नवाब, बाहुबली, मठाधीश, जातिवादी क्षत्रप, और बड़े और दलाल पूंजीपति भी नहीं रहते.
8- नेहरू के संविधान के रहते बड़े-बड़े धनपशुओं ने जातियों, धर्मों के नाम पर संगठन बना लिया है और वे जनता को जनता से लड़ाकर खुद सत्ता का सुख भोग रहे हैं. अगर बाबा साहब का राजकीय समाजवाद वाला संविधान लागू होता तो कोई ऊंच-नीच, छुआछूत, जात-पात, सवर्ण-अवर्ण नहीं रहता. किसी को जाति, धर्म, नस्ल, मूलनिवासी- विदेशी,15 बनाम 85, अगड़ा पिछड़ा, आर्य-अनार्य के नाम पर कोई संगठन बनाने का अधिकार ही नहीं होता. तब कोई जातिवादी या धार्मिक अंधविश्वासी साधू-सन्यासी सत्ता की ऊंची कुर्सी पर नहीं बैठने पाता.
9- बाबा साहब का राजकीय समाजवाद लागू होता तो देश की जनता बहुत खुशहाल होती. देश तरक्की के मामले में अमेरिका को भी काफी पीछे छोड़ चुका होता, जिस तरह मच्छरों का देश या अफीमचियों का देश कहा जाने वाला चीन, तरक्की में सबसे आगे निकल गया वैसे ही हमारा देश भी बहुत आगे निकल गया होता.
डॉ. अंबेडकर के इन विचारों की प्रासंगिकता :- डॉ. अंबेडकर के इन विचारों की प्रासंगिकता का अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि आज के आर्थिक महामंदी के दौर में जिन-जिन देशों में निजी सेक्टर के मुकाबले सरकारी सेक्टर मजबूत रहे हैं, वही देश महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, सूदखोरी, जुआखोरी, महामारी, प्रातिक आपदा, आतंक, अराजकता आदि समस्याओं को हल करने में बहुत हद तक सफल हुए हैं. चीन, वियतनाम, उत्तर कोरिया, क्यूबा आदि इसका जीता जागता और नजदीकी उदाहरण है.
सर्वहारा वर्ग की राजसत्ता के अभाव में राजकीय समाजवाद भले ही पूरी तरह वैज्ञानिक समाजवाद जैसा ना हो मगर अब निजीकरण के विरुद्ध इसे फौरी कार्यक्रम के रूप में क्रांतिकारी शक्तियों को भी अपनाना ही चाहिए तथा निजीकरण के विरुद्ध बाबा साहब डा. अंबेडकर के राजकीय समाजवाद को लागू करवाने के लिए सरकार पर भारी जन दबाव बनाना चाहिए.
प्रकारान्तर से उत्पादन के साधनों के समाजीकरण की बात भगतसिंह की पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशन तथा मार्क्स के कम्युनिस्ट घोषणा पत्र में भी है, परन्तु ध्यान रहे वर्गसंघर्ष के बिना बाबा साहब का यह सपना काल्पनिक ही बना रह जायेगा, अतः उनके सपनों को वैज्ञानिक आधार देने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी बाबा साहब को मानने वाले नयी पीढ़ी के बेरोजगार छात्रों, नौजवानों के ऊपर है.
*उ०प्र०भवन एवं अन्य सन्निर्माण श्रमिक यूनियन मंडल अध्यक्ष सुरेश कनौजिया गोंडा*
*मोबाइल न०* *8573971240*
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