*खून की कालाबाजारी के मामले मे पुलिस और प्रशासन की कार्यवाही अब सवालों के घेरे मे, संस्था के पक्ष मे विभिन्न समाजसेवी संघटनों ने सौंपा ज्ञापन*



      
ब्यूरो मंडल प्रभारी सुरेश कनौजिया गोण्डा

गोण्डा। प्रशासन की तरफ से की गई गिरफ्तारियां और कार्यवाही अक्सर सवालों के घेरे में आती हैं ताजा मामला जनपद गोंडा से जुड़ा हुआ है जहां पर खून की कालाबाजारी करने के आरोप में विगत 1 मार्च को पांच युवकों को बाकायदा एफ आई आर दर्ज करा कर गिरफ्तार किया गया था जिसमें एक संस्था को भी शामिल किया गया द गोल्डन ब्लड नाम से संचालित इस संस्था के अध्यक्ष और सचिव समेत लगभग 15 लोगों पर नामजद एफ आई आर दर्ज की गई जिसमें से पांच की गिरफ्तारी मौके पर दिखाई गई लेकिन प्रशासन ने यह नहीं सोचा था कि उनकी इस गिरफ्तारी और एफ आई आर के पेंच को कोई समझ पाएगा न ही यह सोचा था कि संस्था और इससे जुड़े नौजवानों के प्रति लोगों का ऐसा प्रेम बढ़ेगा कि प्रशासन को भी सोचने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। पूरा मामला कुछ यूं है कि 27 फरवरी को द गोल्डन ब्लड संस्था के अध्यक्ष और सचिव के द्वारा नगर के बीचो बीच स्थित सतीश चंद्र पांडे मेमोरियल अस्पताल मैं खून की कालाबाजारी करने वाले दो व्यक्तियों को पकड़ा गया पुलिस को सूचना दी गई सूचना पर पुलिस पहुंची और संस्था के लोगों ने पकड़े गए दो युवकों को कोतवाली तक खुद पहुंचाया हालांकि पकड़े गए दोनों युवकों ने नाही वहां पर रक्तदान किया था और ना ही रक्त के बदले में कोई पैसे लिए थे ऐसा उन्होंने अपने बयान में खुद कहा अगले 2 दिन के भीतर प्रशासन ने साजिश के तहत एक पूरी साजिश को अंजाम दिया और जिन लोगों ने दो कथित तौर पर खून की कालाबाजारी करने वाले युवकों को गिरफ्तार किया था उनके साथ इन तीनों के ऊपर भी एफ आई आर दर्ज कर इनको भी खून की कालाबाजारी के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया अब यहीं से सारा पेंच शुरू होता है दरअसल औषधि निरीक्षक ओमप्रकाश जिनके पास इस समय बलरामपुर और गोंडा दोनों जिलों का प्रभार है उनके द्वारा एफ आई आर दर्ज कराई गई और जिन धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया गया  वह अपने आप में खुद सवालों के घेरे में है दरअसल ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स की धारा के अंतर्गत औषधियां आती है ना कि खून की कालाबाजारी के तहत और प्रशासन को इस मामले की खुलासा करने की इतनी जल्दी थी कि भाई अभी भूल गए कि ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स की धारा में सिर्फ 7 साल की सजा का प्रावधान है लेकिन गिरफ्तारी का कोई प्रावधान नहीं है तो बिना प्रावधान के किस प्रकार या किस आरोप के तहत इन लोगों को गिरफ्तार किया गया पत्रकार वार्ता में पुलिस अधीक्षक गोंडा और जिलाधिकारी गोंडा ने संयुक्त प्रेस वार्ता कर सभी 5 लोगों की गिरफ्तारी को दर्शाया प्रशासन की जल्दबाजी का अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि जिलाधिकारी गोंडा श्री मार्कंडेय शाही बोलते बोलते यह कह गए कि गरीबों का खून भी लो स्टैंडर्ड यानी मानक के विपरीत होता है और यह लोग लो स्टैंडर्ड खून बेच रहे थे,अब आप खुद सोच कर बताइए कि क्या खून का भी कोई मानक है दूसरा इसी खबर में हम आपको सतीश चंद्र पांडे मेमोरियल अस्पताल के ब्लड बैंक प्रभारी डॉ के के मिश्रा का बयान भी दिखा रहे हैं  जो स्पष्ट तौर पर यह कहते हुए दिखते हैं कि द गोल्डन ब्लड संस्था बहुत अच्छा कार्य कर रही है और इनके द्वारा 32 यूनिट खून सतीश चंद्र पांडे मेमोरियल अस्पताल में जमा कराया गया है और यदि किसी मरीज के पास डोनर उपलब्ध नहीं होता है तो यह लोग आगे आकर के मदद करते हैं साथ ही साथ हम उन दोनों युवकों का भी जो कथित तौर पर खून की कालाबाजारी करते हुए पकड़े गए थे उनका भी बयान आपको दिखाएंगे उन दोनों युवकों ने एक आलम नाम के व्यक्ति का नाम लिया था जबकि पुलिस की एफ आई आर में आलम का कहीं पर कोई नाम नहीं है इससे साफ जाहिर होता है कि यहाँ एक साजिश रची गयी है और इस साजिश के तहत द गोल्डन ब्लड संस्था संस्था के पदाधिकारी गण साथ ही सतीश चंद्र पांडे मेमोरियल अस्पताल के लोगों को जबरदस्ती फंसाया जा रहा था । हालांकि सतीश चंद्र पांडे मेमोरियल अस्पताल के एक युवक का भी नाम सामने आया जो वहां का पूर्व छात्र रह चुका है और एक वर्तमान छात्र का भी नाम आया है जिससे कि सतीश चंद्र पांडे मेमोरियल अस्पताल की भूमिका भी संदिग्ध के घेरे में है गोंडा की नगर कोतवाली में दर्ज एफआइआर में यह स्पष्ट तौर पर लिखा गया है कि पुलिस मौके पर पहुंची और उसने इन सभी युवकों को गिरफ्तार किया जबकि वहां मौजूद लोग और सीसीटीवी फुटेज इस बात की गवाही देंगे की पुलिस को फोन कर बुलाया गया था और यह युवक खुद कोतवाली तक गए थे और उस दिन घर चले गए अगले दिन लौटकर दोबारा कोतवाली में तब आते है जब कोतवाली से इनके पास फोन पहुंच जाता है। हालांकि एसपी गोंडा शैलेश पांडे के गोंडा जनपद में आने के बाद अपराध पर काफी नियंत्रण लगा है लेकिन पुलिस की जल्दबाज़ी वाली कार्रवाई का यह कोई पहला मामला नहीं है इसके पहले 14 अक्टूबर 2020 को एसिड अटैक मामले में युवक की गिरफ्तारी हुई थी जिसमें युवक की माता ने स्पष्ट तौर पर आरोप लगाया था कि उसका बेटा निर्दोष है और उसको पुलिस के द्वारा जबरदस्ती फंसाया जा रहा है।  इसी के साथ एक अन्य मामला जिसमें गायत्रीपुरम घोसियाने में 06 सितंबर 2020 को पुलिस की मारपीट के बाद व्यक्ति की आंख फोड़ने का भी मामला प्रकाश आया था उसमे भी युवक के भाई ने आरोप पुलिस पर लगाया था । हमारी टीम ने पूरे मामले पर गहन छानबीन और पड़ताल की और लगातार कई दिनों तक औषधि निरीक्षक ओमप्रकाश जिनके पास गोंडा और बलरामपुर दोनों जिलों का प्रभार है उनको गोंडा और बलरामपुर में मिलने का प्रयास किया गया लेकिन श्री ओम प्रकाश जी ना तो बलरामपुर में मिले और ना ही गोंडा में मिले हम सिर्फ उनके खाली कुर्सी से ही मिल पाए और यह खाली कुर्सी इस बात का सवाल छोड़ रही थी कि आखिर क्यों वह मीडिया से नहीं मिलना चाहते? इसके साथ ही हम कुछ सवाल और प्रशासन से पूछ रहे हैं जैसे प्रथम सूचना रिपोर्ट में आलम नाम के व्यक्ति का जिक्र क्यों नहीं किया गया दूसरा औषधि निरीक्षक को यह सूचना कैसे मिली कि सतीश चंद्र पांडे मेमोरियल अस्पताल में उसी वक्त खून की कालाबाजारी करने वाले मौजूद हैं जिनको वह जाकर पकड़ लेंगे तीसरा एफ आई आर दर्ज करने में 24 घंटे का समय क्यों लगाया गया चौथा अगर गोल्डन ब्लड संस्था के द्वारा रक्त की कालाबाजारी की जा रही थी तो इस संस्था के द्वारा पूर्व में लगाए गए सभी ब्लड कैंप में मुख्य चिकित्सा अधिकारी गोंडा के द्वारा अनुमति क्यों दी गई और अगर यह संस्था इतना गलत कार्य कर रही थी तो इसमें विधायक और पूर्व सांसद जैसे लोगों ने रक्तदान क्यों किया? देखना यह है कि इन सवालों के जवाब हमें कब तक मिलेंगे? फिलहाल द गोल्डन ब्लड संस्था के अध्यक्ष की जमानत अर्जी को न्यायालय ने मंजूर कर लिया है ।

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