*अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस 2021* *महिला को मजदूर और किसान के रुप में मान्यता दो**अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस*




     ब्यूरो मंडल प्रभारी सुरेश कनौजिया गोण्डा

महिलाओं के मुद्दों पर केंद्रित अंर्तराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने का फैसला 1910 में कोपेनहेगन में आयोजित समाजवादी महिलाओं के द्वितीय अंर्तराष्ट्रीय सम्मेलन में लिया गया था। अगले साल 1911 में दुनिया भर की लाखों महिलाएँ ने अंर्तराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर सड़कों पर उतर कर जुलूस निकले. गत वर्षों में मार्च 8 को विश्व भर में अंर्तराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में स्वीकर किया गया है, और मनाया जाता है। महिला श्रमिकों के, अपने शोषणकारी कामकाजी हालातों के खिलाफ, और अपने अधिकारों को हासिल करने के लिए हुए संघर्षों से ही अंर्तराष्ट्रीय महिला दिवस की उत्पत्ति हुई, और ये संघर्ष आज भी जारी हैं। अपने संघर्षों से महिलाओं ने कुछ अधिकार जरूर जीते हैं, और अपनी कामकाजी परिस्थितियों में भी कुछ सुधार किया है। मगर पितृसत्तात्मक रवैया, महिलाओं के श्रम को कम करके आंकना, वेतन और अवसर की असमानता, और अन्य कई प्रकार के भेदभाव दुनियाभर में आज भी हावी हैं। मजदूर और अन्य कामगारों की परिस्थितियों पर होने वाले हर नवउदारवादी हमले को आज की महिला सहती है।
*भाजपा शासन में महिलाओं के बिगड़ते हालात*
भारत में महिलाओं के हालात में गिरावट, भाजपा के केंद्र में आने के बाद से और तेज हुई है। भाजपा शासन उन पिछड़े और पितृसत्तात्मक नजरियों को बढ़ावा दे रहा है जो महिलाओं को बच्चे पालने और परिवार सम्भालने तक सीमित करना चाहते हैं। *महिलाओं के अपनी पसंद से दोस्ती करने, शादी करने, कपड़े पहनने, या यूँ कहें कि अपनी मर्जी से अपनी जिन्दगी जीने के हर हक पर दक्षिणपंथी ताकतें हमला कर रही हैं।* महिलाओं के साथ हिंसा की घटनाएँ बढ़ रही हैं।

2019-20 के ग्लोबल जेंडर गैप इंडेक्स में भारत 2018 से चार अंक घट कर 153 देशों में 112 वें स्थान पर है। केवल चैदह सालों में भारत, वर्ल्ड इकनॉमिक फोरम के इकनॉमिक जेंडर गैप में 2006 के अपने 110 वें स्थान से 39 अंक पीछे, 2020 में, 149 वें स्थान पर पहुँच गया है। आज भारतीय महिलाओं के पास जो आर्थिक अवसर हैं, वो दुनिया में सबसे न्यूनतम हैं। जून 2020 में वर्ल्ड बैंक द्वारा जारी डाटा के अनुसार भारत की महिला (की) श्रम शक्ति (में) भागीदारी दक्षिण एशिया में सबसे कम है। 1990 के 30.3 प्रतिशत से घट कर 2020 में ये पाकिस्तान (22.2 प्रतिशत) और अफगानिस्तान (21.8 प्रतिशत) से भी कम, केवल 20.3 प्रतिशत रह गया है।

*मान्यता नहीं, कमतर आंकलन, अवैतनिक या कमतर वेतन का*
 इन आंकड़ों का मतलब यह नहीं कि भारतीय महिलाएँ काम नहीं करती हैं; यह ज्यादातर इसलिए है कि महिलाओं का श्रम अक्सर अवैतनिक या कमतर वेतन वाला होता है। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री जयति घोष के अनुसार *‘महिलाओं में रोजगार की गिरावट दरअसल वेतन वाले काम का बिना वेतन के काम में परिवर्तन दर्शाता है’।* घर का काम रोजगार का काम नहीं माना जाता। खाना, जलावन, चारा, पानी आदि जुटाना, या घर के लिए सिलाई, कढ़ाई, बुनाई आदि को रोजगार का काम नहीं माना जाता। अर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन (ओईसीडी) की रिपोर्ट के अनुसार *भारतीय महिलाएं अवैतनिक कार्यों में दिन के छह घंटे लगाती हैं, जबकि भारतीय पुरुष दिन के बावन मिनट लगाते हैं।* शोधकर्ताओं ने पाया है कि अगर अमान्य और कमतर आंका जाने वाला काम भी गिना जाए तो *महिलाओं के श्रम में भागीदारी पुरुषों के 79.8 प्रतिशत से अधिक 86.2 प्रतिशत हो।* ध्यान दें, कि अधिकतर महिलाओं द्वारा किए गए इस श्रम की अमान्यता का असर केवल इन्हीं महिलाओं पर नहीं पड़ता। महिलाओं के इन घर के कामों को अमान्य करने से इन कार्यों का मूल्य, तब भी जब इन कार्यों को घर के बाहर, समाज के लिए किया जाए, भी कम हो जाता है। जब महिलाएँ घर से बाहर इन कार्यों को करती हैं, तो उन्हें बहुत ही कम वेतन मिलता है। सरकार के महिला सशक्तीकरण के हर दावे के बावजूद, असलियत यह है कि हमारे देश में खुद सरकार भी महिलाओं के कार्यों को कमतर आँकती है।

भारत सरकार देश की लाखों महिलाओं को अपनी परियोजनाओं में काम देती है, जैसे आँगनवाड़ी कर्मी, या संयुक्त बाल विकास सेवाओं में सहायक, या राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की आशा या उषा कर्मी, या मिड डे मील योजना की कर्मचारी। ये कर्मी बच्चों और महिलाओं के लिए खाना बनाते-खिलते हैं, और उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखते हैं। इस सब के लिए इन्हें पूरी तरह से कर्मी भी नहीं माना जाता और वेतन की जगह मानदेय या प्रोत्साहन राशि के नाम पर बहुत ही कम पैसा मिलता है। साथ ही, भारत उन देशों में से है जहाँ एक ही काम कर रहे पुरुष और महिलाओं के वेतन का अंतर बहुत अधिक है। आम तौर पर महिलाओं को पुरुषों के समान काम का केवल दो तिहाई वेतन मिलता है।
यही रवैया खेती से जुड़ी महिलाओं के प्रति भी है। महिलाऐं हमारी खेती की बुनियाद हैं। वे फसल की कटाई, पशुपालन, मुर्गीपालन, वन उपज का एकत्रण आदि कई काम करतीं हैं। *देश के ग्रामीण क्षेत्रों की 73 प्रतिशत महिला कर्मी कृषि संबंधित कार्यों पर निर्भर हैं। लेकिन देश की कृषि में उनका योगदान माना ही नहीं जाता। उन्हें किसान नहीं माना जाता। यही पितृसत्तात्मक सोच भारत के मुख्य न्यायाधीश की हाल ही टिप्पणी में भी झलकी जब उन्होंने पूछा कि किसान कानूनों से जुड़े विरोध प्रदर्शनों में महिलाओं और बुजुर्गों को क्यों रखा गया है। महिलाओं द्वारा किया जाने वाले अवैतनिक काम की समस्या केवल भारत में सीमित नहीं है। विश्व भर में महिलाओं द्वारा अवैतनिक कार्यों को दिया जाने वाला समय, पुरुषों के मुकाबले कई गुना है। दुनिया में लैंगिक समानता में सबसे अग्रणी देशों में शुमार, और ग्लोबल जेंडर गैप सूचकांक 2020 में विश्व में दूसरा स्थान प्राप्त नॉर्वे तक में महिलाएं पुरुषों के मुकाबले लगभग दुगना समय घर के ऐसे अवैतनिक कार्यों में देती हैं। जापान) में यह चार गुना से अधिक है। महिलाओं के काम को कमतर आँकना, महिलाओं और *पुरुषों के श्रम के ऐतिहासिक विभाजन और पितृसत्ता, निजी सम्पत्ति और उसके उत्तराधिकार के साथ हुए विकास में उत्पन्न हुआ है।*

*मान्यता के लिए संघर्ष*

आज, महिलाऐं अपने काम को काम का दर्जा दिलाने के लिए, समान अवसरों के लिए, समान वेतन के लिए, और नागरिकों के नाते समान अधिकारों के लिए संघर्षरत हैं। महिला कर्मी, खास तौर पर सरकारी परियोजनाओं में कार्यरत महिला कर्मी, अपने कर्मी होने की मान्यता; मानदेय नहीं, वेतन की लड़ाई लड़ रहीं हैं। महिला कर्मी, समान वेतन की, क्रेच युक्त और यौन उत्पीड़न से मुक्त कार्यस्थल की, और कार्यस्थल और समाज में अपने मान की लड़ाई लड़ रहीं हैं। कर्मियों के खून पसीने से कमाए संगठन और सामूहिक सौदेबाजी के अधिकारों पर शासक वर्गों के लेबर कोड रूपी हमलों के खिलाफ संघर्ष में भी वे लगातार जुड़ रहीं हैं। विभिन्न क्षेत्रों की सैंकड़ों हजारों महिला कर्मी और कर्मचारी ट्रेड यूनियन आन्दोलन के धरना-प्रदर्शनों में हिस्सा ले रही हैं।

महिला किसान भी अपने किसान होने की मान्यता की, अपनी जमीनों के अपने नाम पर पंजीकरण की, पुरुष किसानों के समान ही ऋण और अन्य सुविधाओं की लड़ाई लड़ रहीं हैं। वे भी देश की कृषि को काॅरपोरेट के हवाले करने वाले, किसानों के लिए विनाशकारी, तीन नए कृषि कानूनों के खिलाफ चल रहे किसान आंदोलनों का हिस्सा बन रहीं हैं।

ये संघर्ष ना केवल मौजूदा माँगे रख रहे हैं, बल्कि काॅरपोरेट के फायदे सुरक्षित करने वाली, और पूँजी को चंद हाथों में समेट देने वाली नरेंद्र मोदी की भाजपा सरकार की नवउदारवादी नीतियों का प्रतिरोध भी कर रहे हैं।

ऐसी नीतियों के खिलाफ इन संघर्षों में मेहनतकश जनता - महिला और पुरुष, को जोड़ कर और तेज करना होगा। *नवउदारवादी नीतियों का अंत और पितृसत्तात्मक व्यवस्था में परिवर्तन ही महिला मुक्ति, और समाज में उनकी सही पहचान पाने की ओर, महिलाओं के बढ़ते मार्च में सहायक होंगे।* इस अंर्तराष्ट्रीय महिला दिवस पर, आइए शपथ लें कि *इन संघर्षों को हम सब, खुद आगे बढ़ायेंगे।*

- *डा. के हेमलता*
*राष्ट्रीय अध्यक्ष*
*सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियनस (सीटू)*

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