*सरकार ने तीनों कृषि कानून को डेढ़ साल तक स्थगित करने का प्रस्ताव मास्टर स्ट्रोक माना जा सकता है,शायद नहीं। नए कृषि क़ानून को लागू करने को लेकर मोदी सरकार का न ही यह नया दाँवहै*
ब्यूरो मंडल प्रभारी सुरेश कनौंजिया गोंडा
कुछ लोगो का मानना है कि आरएसएस के हस्तक्षेप के बाद किया गया फ़ैसला हैं, कुछ का कहना है कि नए कृषि क़ानून पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद सरकार के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था। कई जानकार इसे मोदी सरकार का मास्टर स्ट्रोक बता रहे हैं. अगले कुछ महीनों में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं, किसान आंदोलन की वजह से उन राज्यों के विधानसभा चुनाव पर असर पड़ सकता था, जो रिस्क सरकार, पार्टी और संघ नहीं लेना चाहता था।
लेकिन हक़ीक़त यह है कि सरकार के पास दूसरा विकल्प नहीं था।इस संबंध में पहले भी लिख चुका हूं कि मोदी नए कृषि कानूनो को लेकर बुरी तरह से उलझ गए हैं क्योंकि WTO समझौते पर किए गए हस्ताक्षर और दुनिया के बड़े पूंजीपतियों के दबाव के चलते कृषि को वापस लेना दुश्कर होगा। इसीलिए सत्ता पक्ष से हल्ला मचाया जा रहा है कि सरकार द्वारा कानूनों को वापस लिया जाता है तो आने वाले 50 वर्षों में कोई भी नया कानून लाने के लिए किसी भी पार्टी की सरकार की हिम्मत नहीं पड़ेगी कि वह नए कानून लाए। जबकि वास्तविकता यह है की जनविरोधी, मजदूर विरोधी, किसान विरोधी कोई भी कानून लाया जाएगा तो उसका हश्र इसी प्रकार से आंदोलन के रूप में दिखाई देगा।
नए कृषि क़ानूनों पर सरकार के नए प्रस्ताव को सुधींद्र कुलकर्णी 'अपनी बात से पीछे हटना' करार देते हैं।उन्होंने कहा कि "ये प्रस्ताव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वाभाव के बिल्कुल विपरीत है। नरेंद्र मोदी के बारे में कहा जाता है कि एक बार जो वो क़दम लेते हैं, तो पीछे नहीं हटते. लेकिन ये प्रस्ताव, उनकी इस छवि के उलट है।" यह प्रस्ताव दवाब में लिया गया फ़ैसला है। सरकार के पास दूसरा कोई चारा नहीं था। दो महीने से किसान सड़कों पर बैठे थे, हिंसा नहीं हुई, माहौल शांति पूर्ण रहा, दुनिया भर से प्रतिक्रियाएँ आईं, सुप्रीम कोर्ट की कमेटी से भी कोई फर्क़ नहीं पड़ा, आख़िर में ट्रैक्टर रैली के आयोजन की बात हो रही है - इन सबसे सरकार को बात समझ में आ गई कि किसान झुकने वाले नहीं हैं।"
पहले भी कई क़ानून पर पीछे हट चुकी है सरकार
ये बात सही है कि ये पहला मौक़ा नहीं है, जब किसी क़ानून पर केंद्र सरकार ने अपना स्टैंड बदला हो। इससे पहले कृषि से जुड़े भूमि अधिग्रहण क़ानून पर भी केंद्र सरकार पीछे हटी थी। तब संसद में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भूमि अधिग्रहण क़ानून का विरोध करते हुए केंद्र सरकार को 'सूट-बूट की सरकार' कहा था। इसके अलावा चाहे एनआरसी की बात हो या फिर नए श्रम क़ानून की, इन पर भी सरकार उतनी आक्रामक अभी नहीं दिख रही है।
ग़ौर करने वाली बात है कि जिन तीन क़ानूनों का ज़िक्र किया, उन पर आरएसएस और उनसे जुड़ी संस्थाओं को पहले आपत्ति थी। फिर चाहे भूमि अधिग्रहण क़ानून की बात हो या आरसीईपी समझौता।
यही वजह है कि जानकार सरकार के इस फ़ैसले को आरएसएस के दवाब में लिया गया फ़ैसला बता रहे हैं।
यदि सरकार तीनों कृषि कानूनों को रद्दी कि टोकरी में डाल देती है तो भी जान छूटने वाली नहीं है क्योंकि सरकार को तब एम एस पी पर फैसला करना पड़ेगा।
बरहाल संघर्ष केवल भारत तक सीमित नहीं है बल्कि दुनिया भर के कई देशों में आंदोलन चल रहे हैं। जिनका प्रचार प्रसार सरकारों द्वारा दबाया जा रहा है।
असित कुमार सिंह सचिव एटक कानपुर
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