*किसान बिरोधी बीजेपी सरकार गुगी बहरी आंधी होने का ड़ोग कर रही है*
ब्यूरो मंडल प्रभारी सुरेश कनौंजिया गोण्डा
जब भी किसानों को निर्यात बढ़ने से लाभ होने लगता है सरकार निर्यात बंद कर देती है।
कमोडिटी एक्सचेंज में जब भविष्य का मूल्य निर्धारित होना शुरू हो गया और किसानों को लाभ मिलने ही वाला था कि कमोडिटी एक्सचेंज बंद कर दी गई।
अमुल कंपनी जो कि सहकारिता में थी उसको पूंजी इकट्ठा करने के नाम पर पब्लिक लिमिटेड में बदल दिया गया।
उधर विश्व व्यापार संगठन नहीं चाहता कि किसानों को यैलो या एंबर सब्सिडी मिले। भारत में किसानों की एग्रीगेट मेजर आफ सपोर्ट के हिसाब से कुल सब्सिडी माईनस ग्यारह प्रतिशत है।
यानि प्रणाली कोई भी हो यदि अधिशेष मूल्य का बड़ा भाग यदि टुटपुंजिया वर्ग के पास जा रहा हो तो बड़े पूंजीपति या विकसित देश इसको जारी नहीं रहने देंगे। वर्तमान कृषि विपणन प्रणाली जो कि पूरी तरह बाजार के नियमों पर नहीं चलती है तमाम खामियों के बावजूद साझीदार किसानोें को आजीविका की, बिचोलियों को मुनाफे की और गरीब उपभोक्ता को खाद्य सुरक्षा देती है, बड़े पूंजीपतियों को मंजूर नहीं है।
असल में सारे संगठित उद्योग में मांग का भारी संकट पैदा हो चुका है जिसकी वजह पूंजी का भारी निवेश और श्रम-बचत तकनीकी है। अतः बड़े पूंजीपति शिक्षा, स्वास्थ्य व कृषि पर कब्जा करने के लिए प्रयास रत हैं।
यह निश्चित है कि पूंजीपतियों की यह नीति भी पूंजीवाद को बचा नहीं पाएगी। क्योंकि यदि पूंजीवादी व्यवस्था यदि किसानों को हरा देती है तो भारी संख्या में बटाईदार किसान आजीविका खो देंगे। कारपोरेट की मोनोपोली की वजह से कृषि भूमि का रेंट भी घटेगा मतलब छोटे भुमालिकों की आय भी घटेगी।
यदि किसान जीत जाते हैं तो वे पूरे देश में और सभी फसलों के लिए एपीएमसी एक्ट के तहत 48000 मंडियों की मांग करेंगे। यह प्रणाली मजदूरों द्वारा उत्पादित अधिशेष को टुटपुंजिया किसानों में बांट देगी। पर अन्य उद्योगों में मुनाफा न रहने के कारण बैंकिंग, स्टाक मार्किट और पूंजीवादी व्यवस्था डूब जाएगी।
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