*अनपढों और अपराधियों का प्रत्रकारिता कीओर रुख- समाज के लिएं घातक/ जिस तरफ बकील बनने की लग रही हैं होड़ उसी तरह हर गली में मिलेगा पत्रकार*



 *ब्यूरो मंडल प्रभारी सुरेश कनौंजिया गोण्डा*

लेखक …सुरेश कनौंजिया(मंडल प्रभारी ऑल इंडिया न्यूज)

पत्रकारिता का गिरता स्तर…

अनपढ़ों और अपराधियों का पत्रकारिता की ओर रुख करना समाज के लिये बड़ा ही घातक शिद्ध हो रहा है। जल्द अपना नाम कमाने ग्लैमर की चाह और पुलिस-प्रशासन के बीच भौकाल गांठने के लिए जहां पहले अपराधी किसी राजनीतिक हस्ती या पार्टी का दामन थाम लेते थे, वहीं वर्तमान में ये ट्रेंड बदल गया है। तमाम अपराधी प्रवृत्ति के लोग अब पत्रकारिता और वकालत की तरफ रुख कर रहे हैं। परन्तु वकालत की डिग्री में लगने वाले समय और जरूरी पढ़ाई की वजह से पत्रकारिता वर्तमान में अपराधियों का सबसे पसंदीदा क्षेत्र बनता जा रहा है।
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया जैसे दूसरे साधन आ जाने के बाद कोई भी शख्स कभी भी खुद को छायाकार या पत्रकार खुद ही घोषित कर दे रहा है। दुखद पहलू ये है कि जिस पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है, उसमें कभी बुद्धिजीवी और समाज के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा लिए लोग आते थे, जबकि आज अंधाधुंध अखबारों, पत्रिकाओं, वेब पोर्टल्स के आ जाने के बाद बड़ी संख्या में अपराधियों को भी ‘प्रेस’ लिखने का सुनहरा मौका मिल गया है। इसके सहारे वो न सिर्फ़ अपने पुराने अपराधों को छुपाए हुए हैं, बल्कि नये अपराधों को भी जन्म देकर, पुलिस और प्रशासन पर अपनी पकड़ भी मजबूत कर रहे हैं। वे तमाम तरह के गैरकानूनी कार्य पत्रकारिता की आड़ में संचालित करने में लगे हैं।
गणना और साक्ष्यों के मुताबिक़ कक्षा 5वीं या 8वीं और कई मामलों में तो अशिक्षित और जिनकी गणना कल तलक जूता खोर के नाम से पहचाने जाने वाले लोग भी खुद को मीडियाकर्मी बताते घूम रहे हैं। इनकी संख्या भी सैकड़ों में मिल जायेगी। अब आप अपने जनपद समेत सभी तहसीलों के आंकड़ो को ही ले लीजिए फिर चाहे वो इलाकाई कस्बे हों अथवा ग्रामीणांचल जितनी वहाँ की आबादी नहीं होगी उससे कहीं ज्यादा पत्रकार होंगे। यहाँ तक कि जो कल तलक आवाम ही नहीं बल्कि पुलिस प्रशासन के बीच अराजकतत्व जूता खोर के नाम से जाने जाते थे। वो भी अब गली में अपने आपको पत्रकार के रूप में प्रदर्शित करते हुए इतराते घूम रहे हैं। जिनका ना ही खबरों की वास्तविकता से कोई वास्ता होता है। और ना ही इनको खबर संकलन अथवा लेखन का ज्ञान। ये और बात है कि ये नौकरशाहों, नेताओं के इर्द गिर्द घूमने और वीडियो बनाकर वायरल कर अपने आपको योग्य पत्रकार के रूप में दर्शा केवल जनता जनार्दन ही नहीं बल्कि पुलिस प्रशासन के बीच भी रौब झाड़ने में माहिर होते हैं। जिनके क्रिया कलाप समाज के लिये बड़े ही घातक होते हैं।
अब बड़ा सवाल ये है कि वास्तविक पत्रकारों की मर्यादा और पत्रकारिता जैसी महत्वपूर्ण विधा को अपराध और अपराधियों के चंगुल से कैसे बचाया जाए? और आखिर बचायेगा तो कौन? जब जिम्मेदार प्रशासनिक भी ऐसे आई डी छाप अनपढ़ पत्रकारों को ही उनकी चाटुकार पिछलग्गू नीति के कारण बड़का पत्रकार मानते हैं।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

डिप्टी रजिस्ट्रार ने आचार्य स्वदेश को प्रांतीय सभा प्रधान का दायित्व सौपा-शास्त्री विनोद आर्य (स्वामी रामदेव एवं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने दी बधाई)

*वार्षिक चुनाव वार्षिक लोक निर्माण विभाग श्रमिक संघ जिला शाखा बलिया*

*31 बुलेट मोटरसाइकिलों पर कार्यवाही व तीन को किया सीज*