*आज कर्मचारी शिक्षक सरकार की त्वरित निजीकरण की नीति से भयाक्रांत है*



          रिपोर्ट सुरेश कनौंजिया गोण्डा

आज कर्मचारी शिक्षक सरकार की त्वरित नीजीकरण की नीति से भयाक्रांत है कब वह प्राइवेट के हाथो में चला जाएगा।देश की सरकार प्रतिष्ठित और मुनाफा वाले उपक्रमों को नहीं छोड़ रही है।प्रदेश उसके अनुकरण में क्यू पीछे रहेगी।प्रदेश में अंशदाई पेंशन व्यवस्था 2005से ही लागू है वह बात अलग है कि 10वर्ष की सेवा पूरी होने के बाद भी टियर ,1का खाता नहीं खुल पाया था।DA/DR भारत सरकार ने 23अप्रैल को फ्रीज किया प्रदेश सरकार ने 24अप्रैल को आदेश जारी कर दिया।प्रदेश सरकार की तत्परता देखने लायक है। यहां का वित्त विभाग का मूल्य सूचकांक से कोई मतलब नहीं रखता न ही da की गणना करता है।भारत सरकार da दे देती है तब कई महीने के बाद चेट आती है।इसी से सोचिए अगर वहा 10विभाग बिकेगा तो दुगुना बिक जाएगा।अनेक भत्ते ख़तम कर आउटसोर्सिग  की बोलबाला ने ऐसे ही कर्मचारियों कि कमर तोड़ दी है।
   अब सवाल है कि इन अन्यायो के खिलाफ लड़े कौन।कर्मचारी शिक्षक पेंशनर यह कहते हुए पाए जाते है पदाधिकारियों गण अपने निजी लाभ में लगे रहते है।पदाधिकारी को कहते हुए सुनते है कि कर्मचारी का जज्बा नहीं रह गया।वह संघर्ष करना नहीं चाहता।
  विधान परिषद की कुछ सीटों का चुनाव होने है।शिक्षकों के कुछ लोग यह कहते हुए सोशल मीडिया पर पाए जाते है की विधान परिषद में पहुंच कर पेंशन ले लेंगे। शिक्षकों की 8सीट तो रिज़र्व है स्नातक से भी ज्यादातर आते रहे है।लेकिन बिना सड़क पर संघर्ष किए वेतन हो या और लाभ नहीं मिला।
   कर्मचारियों में भी यह भावना बड़ी तेजी से उभर रही है कि सदन में पहुंचकर कर अपनी मांग आसानी से पूरी करा लेंगे।जानकारी के अनुसार da की केंद्रीय समानता की लड़ाई 1666/67 में62की हड़ताल से मिली ।1986में वेतन की समनता की लड़ाई हड़ताल से मिली।1994/95में प्रोन्नति वेतन हड़ताल से मिली 2005में 1/1/04से da मर्जर का लाभ हड़ताल से मिला।मेरा अनुभव है कि कर्मचारी शिक्षक जो कुछ पाए है सिर्फ और सिर्फ  संघर्ष से।यह भ्रम दूर जितनी जल्दी दूर कर सके तो उतना ही अच्छा होगा।
   फिर वही आते है कि इस लड़ाई को लड़े कौन।कर्मचारी नेता और कर्मचारी एक दूसरे पर अटूट विश्वास करेगे कैसे।बिना विश्वास के लड़ाई मन से हो नहीं पाएगी।मेरे विचार से दोनों को गहरे चिंतन की आवश्यकता है।कर्मचारी शिक्षक कमोवेश उन्हें ठीक तरीके से बताया जाय तो लड़ने मै कोताही नहीं बरतेगे।समय का असर समाज पर पड़ता है किन्तु इतना भी नहीं की वह पंगु बन जाय।
जहा तक नेतृत्व का प्रश्न है उसे ज्यादा चिंतन की जरूरत है।यथा
  उसे समाज के सामने जो भी बात हो उसे साफ साफ बताने में कोताही नहीं बरतनी चाहिए।
  यह भी  सोचना होगा कि जो मान प्रतिष्ठा मिली है वह न तो GOD गिफ्टेड है और न हो बाप गिफ्टेड है वह सिर्फ कर्मचारियों ने दी है।उसका प्रयोग शत प्रति शत देने वाले के ऊपर किया जाना चाहिए।न कि अपनी  स्थिति मजबूत करने और मंत्री विधायक बनने के लिए।कोई यदि अपनी मेहनत से  बन जाय तो शौक से बने किन्तु कर्मचारियों को सब्ज बाग दिखा कर नहीं।
  अंत में कर्मचारियों शिक्षकों से और नेतृत्व से करबद्ध प्रार्थना है कि समय इतिहास लिख रहा है ।अपना नाम कहा लिखना चाहते है तय कर लीजिए।
कोई बात नागवार गुजरी हो तो माफ करिएगा

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